अहम, ध्यान आकर्षण की प्रबल इच्छा

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यह बहुत ही निराशाजनक है कि आजकल प्रायः हर युवक, कामयाब माने जाने वाले लोग तथा प्रतिष्ठित लोग केवल ध्यान आकर्षित करने के लिए ही कार्य करते हैं. वे लोग अपने अहम के शिकंजे से कभी निकल ही नहीं पाते हैं. स्वभाव से अहम सदा और अधिक पाने की कामना में रहता है और इसलिए वह सदा भिक्षुक ही रहता है. अहम भाव की समस्या यह है कि जब अहम की संतुष्टि होती है तो हम ‘श्रेष्ठता मनोग्रंथि’ से संघर्ष करते हैं और जब अहम लालायित रहता है तो हम ‘हीन भावना’ से ग्रस्त रहते हैं. हर हाल में अहम हमें हमारे मन की शांति से वंचित करता है. हमारा प्रेरक बनने के लिए अहम हमसे हमारे मन की शांति छीन लेता है. भला एक कंघी खरीदने के लिए कोई अपने बाल बेचता है क्या?

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अहम के कारण हम परिस्थितियों पर विजय पाने के लिए सदा संघर्ष करते रहते हैं. हम सदैव श्रेष्ठतर बनने की होड़ में लगे रहते हैं. परन्तु जब हम अहम से आगे निकलते हैं तब हम केवल स्वयं पर विजय हासिल करना चाहते हैं- हम अपने सामर्थ्य को पहचानकर उसका सही उपयोग कर पाते हैं.

जीवन में हम सब एक दौर से गुज़रते हैं जब हमारा अहम हम पर हावी रहता है और हम हर कार्य दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए करते हैं. यह वह चरण है जब अच्छा तभी अच्छा होता है जब वह दूसरों का ध्यान आकर्षित करता है. दूसरों द्वारा सराहे जाने पर बुरा भी अच्छा बन जाता है. इसके प्रतिकूल यदि अच्छाई दूसरों का ध्यान आकर्षित करने में विफल रहती है तो वह भी बुरी बन जाती है. अहम के अस्तित्व का आधार दूसरों द्वारा प्रशंसा तथा उनका ध्यान आकर्षित करना है. पर हमें इस दौर से बाहर निकलने का हर संभव प्रयास करना चाहिए.

जब अहमभाव आता है तो बाकी सब कुछ चला जाता है और अहंभाव के जाने से बाकी सब कुछ आता है.

अहमभाव को संतुष्ट व खुश रखने की चाह में कितने अनमोल रिश्ते टूटे हैं? यद्यपि अहम को छोड़कर हमें रिश्तों को बचाना चाहिए पर दुर्भाग्यवश हम रिश्तों को त्यागकर अहम को बचाने पर अधिक महत्त्व देते हैं. वास्तव में रिश्तों की अहमियत के आगे अहम की कीमत कुछ भी नहीं है.

अपने अहम को प्रधानता देने के कारण हमें कितनी बार सुनहरे सुअवसरों से हाथ धोना पड़ता है. हर क्षण बोझिल होता है, हर परिस्थिति तनावपूर्ण होती है, प्रत्येक पारस्परिक क्रिया कठिन होती है……..अहंभाव से भरा दिल सदैव खतरों से खेल रहा होता है. अहम और शान्ति में एक पल का भी मिलाप संभव नहीं है.

मुँह में मांस का एक टुकड़ा रखने वाले कौए का अन्य सभी पक्षी पीछा करते हैं. पर जब कौआ मांस का टुकड़ा गिरा देता है तो सभी पक्षी उस टुकड़े की ओर चले जाते हैं. अब आसमान में अकेला कौआ टिप्पणी करता है, “वह मांस का टुकड़ा गवांकर मैंने सम्पूर्ण आज़ादी हासिल कर ली है.”

स्वयं को अहम से मुक्त करने में अपरिमित आज़ादी है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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