कृष्ण की बांसुरी की कहानी

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : आत्मसमर्पण, निष्ठा

कृष्ण की बांसुरी के बारे में एक सुन्दर कहानी है. हम सब जानते हैं कि कृष्ण सदा अपने हाथ में बांसुरी पकड़ते हैं. वास्तव में इसके पीछे एक विख्यात कहानी है. हर रोज़ कृष्ण बगीचे में जाकर सभी पौधों से कहते थे, “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.” यह सुनकर सभी पौधे अत्यधिक प्रसन्न होते थे और जवाब में वे कृष्ण से कहते थे, “कृष्ण, हम भी आपसे प्रेम करते हैं.”

एक दिन अचानक तेज़ी से दौड़ते हुए कृष्ण बगीचे में आए और सीधे बांस के वृक्ष के पास गए.flute4 वृक्ष ने कृष्ण से पूछा, “कृष्ण, क्या बात है?” कृष्ण ने कहा, “यद्यपि यह बहुत मुश्किल है परन्तु मुझे तुमसे कुछ पूछना है.” बांस ने कहा, “आप मुझे बताइए. यदि संभव होगा तो मैं अवश्य आपकी सहायता करूँगा.” इस पर कृष्ण बोले, “मुझे तुम्हारा जीवन चाहिए. मैं तुम्हें काटना चाहता हूँ.” बांस ने क्षणभर के लिए सोचा और फिर बोला, “आपके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है? क्या दूसरा कोई रास्ता नहीं है?” कृष्ण बोले, “नहीं, बस यही एक रास्ता है.” बांस ने कहा, “ठीक है, मैं स्वयं को आपको समर्पित करता हूँ.”

जब कृष्ण बांस को काटकर उसमें छेद कर रहे थे तब बांस दर्द से चिल्ला रहा था क्योंकि छेद बनाने से बांस को बहुत पीड़ा हो रही थी. परन्तु काटने व तराशने की प्रक्रिया के दौरान होने वाली पीड़ा और दर्द को सहने के बाद, बांस ने स्वयं को एक मनमोहक बांसुरी में रूपांतरित पाया. यह बांसुरी हर समय कृष्ण के साथ रहती थी.

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इस बांसुरी से गोपियाँ भी ईर्ष्या करती थीं. उन्होंने बांसुरी से कहा, “अरे, कृष्ण हैं तो हमारे भगवान पर फिर भी हमें उनके साथ केवल कुछ समय ही व्यतीत करने को मिलता है. वह तुम्हारे साथ ही सोते हैं और तुम्हारे साथ ही उठते हैं. तुम हर समय उनके साथ रहती हो.” एक दिन उन्होंने बांसुरी से पूछा, “हमें इसका रहस्य बताओ. क्या कारण है कि भगवान कृष्ण तुम्हें इतना संजोकर रखते हैं?”

बांसुरी ने उत्तर दिया, “इसका रहस्य यह है कि मैं अंदर से खोखली हूँ. और मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं है.”

सही मायने में आत्मसमर्पण इसी को कहते हैं: जहाँ भगवान आपके साथ जैसा वह चाहें, वैसा कर सकते हैं. इसके लिए आपको डरने की ज़रुरत नहीं है- केवल स्वयं को पूर्णतया समर्पित करने की आवश्यकता है. वास्तविकता में आप कौन हैं? आप प्रभु का ही स्वरुप हैं.

सीख:
ईश्वर को पता है कि हमारे लिए क्या सर्वोत्तम है. उन्होंने हमारे लिए सर्वोत्तम आयोजित किया है. हमें अपना सर्वश्रेष्ठ करने के बाद शेष सब प्रभु पर छोड़ देना चाहिए. हमारी दृष्टि सीमित है. हम परीक्षाओं व पीड़ा से घबराते हैं. पर हमें इस बात का अहसास नहीं होता है कि आने वाले समय में इसमें हमारा भला निहित होता है. जब हम स्वयं को सम्पूर्ण रूप से ईश्वर के चरणों में समर्पित करते हैं तो प्रभु हमारे भले का उत्तरदायित्व अपने हाथ में ले लेते हैं और हमें सदा सर्वश्रेष्ठ ही मिलता है.

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Source:  www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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