यात्रा उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी की मंज़िल

एक समय एक राजा था जिसे अपना आराम तथा भोग-विलास बहुत प्रिय था. वह लाल गुलाब से ढके बिस्तर पर सोता था और सबसे अधिक स्वादिष्ट भोजन खाता था. एक दिन, राजा और उसके दरबारी शिकार करने निकले.hunting1 सभी ने शिकार का आनंद उठाया और जब शिकार समाप्त हुआ, तब अँधेरा हो चुका था. राजा अपनी टोली का नेतृत्व कर रहा था पर पर कुछ समय बाद उसे अहसास हुआ कि वह अकेला था. वह अपने समूह से अलग हो गया था. टोली के लोगों ने राजा को ढूँढ़ने की कोशिश की पर जब वे विफल रहे तो वे सब वापस लौट गए.

राजा अत्यंत भूखा व थका हुआ था. वह इस अनपेक्षित परिस्थिति से अत्यधिक गुस्से में था. जब वह घुड़सवारी करते हुए कुछ दूर और पहुँचा hunt3तो उसे एक कुटिया दिखी जहाँ एक पंडित पूजा कर रहा था. राजा ने पंडित को अपनी परिस्थिति बताई और पंडित से प्रार्थना की कि वह उसे उसका साम्राज्य व विलासिता वापस दिलाने में उसकी मदद करे. पंडित मुस्कुराया और राजा से बोला, “मैं तुम्हें एक मंत्र सिखाऊँगा. अपना साम्राज्य वापस पाने के लिए तुम्हें यह मन्त्र आग के घेरे में चालीस दिन खड़े रहकर दोहराना होगा.”hunt4

राजा ने शीघ्र ही मन्त्र सीख लिया और पंडित के अनुदेश का पालन किया. परन्तु चालीस दिनों की इस तपस्या के बाद भी कुछ नहीं हुआ. पंडित से पूछने पर, उसने हिदायत दी कि इस बार वह इस मन्त्र को सबसे ठंडी नदी में खड़े होकर दोहराए.hunt6 परन्तु इस प्रकार ४० दिनों तक पूजा करने पर भी कुछ हासिल नहीं हुआ. इस प्रकार राजा के सारे प्रयास व्यर्थ होने पर, वह अत्यधिक परेशान व निराश था. तब पंडित ने राजा को समझाया कि उसे उसकी प्रार्थना का फल इसलिए नहीं मिला क्योंकि राजा ने मन्त्र का उच्चारण, मन्त्र पर ध्यान केंद्रित करके नहीं बल्कि सदा उसके परिणाम पर ध्यान रखते हुए किया था. इस कारण वह विफल रहा था.

सीख :

हमें कोई भी काम करते समय केवल उसके अंतिम परिणाम को देखने के बजाय, उस कार्य पर ध्यान केंद्रित रखकर उस कार्य का आनंद लेना चाहिए. अगर हम कोई कार्य बिना समझ व रूचि के, मात्र उसे करने के उद्देश्य से करेंगें तो हमें कभी भी उसका वांछित फल नहीं मिलेगा. प्रत्येक कार्य से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है. अतः यात्रा उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी की मंज़िल.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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