जन्माष्टमी

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  यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् !

जब जब संसार में धर्म का ह्रास होता है, सदा कृपालु निराकार भगवान उचित व नया रूप लेकर, धर्म के उत्थान हेतु, लोगों के समक्ष प्रकट होते हैं. कुछ विशिष्ट कारणों से भगवान श्री कृष्ण, जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार थे, इतिहास के सबसे लोकप्रिय व सबसे शक्तिशाली मानव अवतरण माने जाते हैं. कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है और लोग कृष्ण को अनेकों नामों से जानते हैं- रास रसिला, लीलाधर, देवकी नंदन, गिरिधर, माखन चोर, माधव इत्यादि.

जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण के जन्म के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास से दुनिया भर में मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि द्वापर युग के अंतिम चरण में भाद्रपद माह के रोहिणी नक्षत्र में तथा कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था. जन्माष्टमी को विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे कि कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयंती तथा श्री जयंती. लगभग ५००० वर्ष पूर्व, भगवन श्री कृष्ण के जन्म का एक मात्र उद्देश्य धरती को राक्षसों की दुष्टता से मुक्ति दिलाना था. भगवन कृष्ण ने महाभारत में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उन्होंने भक्ति व अच्छे कर्मों के सिद्धांतों का प्रचार किया था जिसका वर्णन भगवत गीता में गहराई से है.
 भगवन कृष्ण का जन्म :

मथुरा का शासक, कंस, एक निष्ठुर राजा था जिससे उसकी प्रजा बहुत डरती थी. कंस की बहन, देवकी, का विवाह जब वासुदेव से हुआ तब भविष्यवाणी हुई थी कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का नाश करेगा. भयभीत व क्रोधित कंस, अपनी बहन को मारना चाहता था पर वसुदेव ने कंस से वादा किया कि वह अपना हर नवजात शिशु कंस के हवाले कर देगा. कंस मान तो गया पर उसने देवकी व वसुदेव को कारगाह में बंद कर दिया.

भाद्रपद माह की अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ. jn3और भगवान विष्णु के आदेशानुसारjn2 वसुदेव कृष्ण को उनके जन्म के तुरंत बाद बाबा नन्द व माता यशोदा के पास गोकुल ले गए.jn5 इस प्रकार कंस की आँखों में धुल झोंककर, वसुदेव भगवान श्री कृष्ण को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा पाए.jn6

भगवान श्री कृष्ण का जीवन तीन चरणों में बाँटा गया है- वृन्दावन लीला, द्वारका लीला और कुरुक्षेत्र लीला.

वृन्दावन लीला

गोकुल में भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ बड़े हुए और उन्होंने अपने गोकुल- वृन्दावन समयकाल में कई लीलायें दिखाईं. इसमें से कुछ प्रमुख हैं- राक्षसी पूतना का वध, अधसुर राक्षस का नाश, धेनुकासुर का अंत, वृन्दावन में जहरीले सर्प, कालिया का वध करके यमुना नदी की पवित्रता लौटना, असुर प्रलम्ब का विनाश, गोपिकाओं के साथ रास-लीला, तथा अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्रदेव का अहम नष्ट करना.

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इसके पश्चात, कुछ वर्षों बाद श्री कृष्ण ने मथुरा लौटकर पापी कंस का अंत किया और महाराजा उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा प्रतिष्ठित किया.

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द्वारका लीला के दौरान कृष्ण ने सत्यभामा, गरुड़ व सुदर्शन चक्र के अभिमान पर प्रहार किया था.

कुरुक्षेत्र लीला का सबसे विशिष्ट अंश कृष्ण का पांडवों तथा कौरवों के साथ सम्बन्ध था. इस दौरान भगवान कृष्ण ने ऐसी कई परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं जो आगे जाकर महाभारत के युद्ध का कारण बनीं. jn12इस विश्व विख्यात युद्ध के दौरान भगवत गीता की रचना हुई थी happiness8जिसके द्वारा भगवान श्री कृष्ण ने हमें अच्छे व बुरे में भेद करना सिखाया तथा हमें अच्छे कर्मों के लिए प्रेरित कर अपने सारे कार्य ईश्वर को समर्पित करना सिखाया. भगवत गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो घर-घर में तथा प्रत्येक मंदिर में रखा व पूजा जाता है.

जन्माष्टमी उत्सव

देश-विदेश के हिन्दू इस पर्व को बहुत ही आनंद व उत्साह से, दिनभर उपवास रखकर तथा मध्यरात्रि तक जग कर मनाते हैं. लगभग प्रत्येक घर तथा मंदिर में बाल गोपाल को झूले में झुलाया जाता है. jn22कई मंदिरों में भगवद गीता के पाठ का आयोजन भी किया जाता है.

महाराष्ट्र- महाराष्ट्र राज्य में गोकुलाष्टमी को दही हांडी के रूप में मनाया जाता है.

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उत्तरी तथा पूर्वी भारत-
उत्तरी भारत के प्रसिद्द स्थान जैसे मथुरा, वृन्दावन और गोकुल हैं, जहाँ श्री कृष्ण ने अपना बचपन बिताया तथा समस्त गोपियों का मन मोहा था. यहाँ दूर-दूर से जन्माष्टमी पर बहुत से लोग आते हैं.
द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर विशेष उल्लेख योग्य है.

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पूर्वी भारत में भागवत पुराण के १०वे स्कन्द से पुराण का प्रवचन होता है.

दक्षिण भारत-
सभी घरों के बाहर ख़ूबसूरत रंगोली बनती है तथा घरों के चौखट पर गृहणियाँ श्री कृष्ण के पदचिन्ह बनातीं हैं. गीत गोविन्दम् तथा कृष्ण सम्बन्धी अन्य भक्तिपूर्ण गीत गाए जाते हैं. दूध व दही से बने आहार भगवान कृष्ण को भोग लगते हैं.
गुर्वायुरपुर का कृष्ण मंदिर विशेष महत्ता रखता है, क्योंकि कहा जाता है कि द्वारका शहर के समुद्र में डूब जाने के उपरान्त गुर्वायुरपुर में भगवान कृष्ण की प्रतिमा की स्थापना हुई थी.

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      कृष्ण शब्द का अर्थ:

कृष्ण= कृष + ण अर्थात कृष्ण वह हैं जो हृदय का विकास करते हैं.

कृष्ण शब्द के तीन अर्थ हैं-

१) कृषिति इति कृष्णा- जो जोतता है वह कृष्ण है. हमारा हृदय मैदान का प्रतीक है. हमें हृदय से घासपात(हानिकर गुणों) को निकालकर, हृदय को प्रेम से भरना चाहिए. हृदय में भगवान के नाम के बीज बोन चाहिए.

२) कर्षति इति कृष्णा- चूँकि वह आकर्षित करता है, वह कृष्ण है. कृष्ण में आकर्षित करने की सर्वोच्च शक्ति है. अपने कार्यों, लीलाओं, संगीत तथा मधुर शब्दों द्वारा कृष्ण सभी को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं.

३) कृष्यति इति कृष्णा- उन्हें कृष्ण कहते हैं क्योंकि वह परमानंद प्रदान करते हैं. हम सब ख़ुशी की तलाश में हैं. भगवान जो आनंद की अभिव्यक्ति हैं, हम सब के भीतर हैं. हमें अपने भीतर आनंद के स्त्रोत को पहचानकर सदा प्रसन्न रहना चाहिए.

जन्माष्टमी के इस पावन अवसर पर भगवान कृष्ण द्वारा दी गई इस सार्वलौकिक शिक्षा पर प्रकाश डालना उचित रहेगा-
भगवान में सम्पूर्ण श्रद्धा रखकर हमें अपना कर्त्तव्य निष्ठा से निभाना चाहिए तथा सदा सहायक रहकर अपना जीवन परिष्कृत करना चाहिए. हमें अपने सभी कार्य भगवान को समर्पित करने चाहिए- भगवान से एकात्मकता अनुभव करने का यही तरीका है.

श्री कृष्ण जिसका नाम है,
गोकुल जिसका धाम है!
ऐसे श्री भगवान को बारम्बार प्रणाम है.

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