पंडित और मूर्ख

आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : श्रद्धा

एक समय एक अत्यंत ज्ञानी व बुद्धिमान पंडित थे.priest वह सभी शास्त्रों में निपुण थे तथा बहुत ही आध्यात्मिक व प्रेरणाप्रद व्यक्ति थे. वह विभिन्न समुदायों में जाकर लोगों को शिक्षित करते थे.

एक बार वह एक गाँव में गए जहाँ उन्हें एक सरोवर दिखाने ले जाया गया. सरोवर के बीच एक टापू था जिसपर एक आदमी रहता था. priest2वह आदमी बहुत ही भोला-भाला था और इस कारण बहुत से लोग उसे मूर्ख समझते थे. जब पंडित सरोवर के करीब पहुँचे, तो उन्होंने उस आदमी को भजन गाते सुना, “भज गोविन्दम, भज गोविन्दम, मूढ़मते …..” लेकिन उस मूर्ख का उच्चारण बहुत ही बेकार था. स्पष्ट था कि उसे कुछ ज़्यादा ज्ञान नहीं था.

कुछ देर भजन सुनने के बाद, पुजारी ने सोचा, “हरे राम! इसके भजन से तो मेरे कान दुख रहे हैं. यह तो बहुत सारी गलतियाँ कर रहा है. मुझे इस आदमी की मदद करनी ही होगी.” अतः सहानुभूतिपूर्वक पंडित नाव में बैठे और उस आदमी को सिखाने, उस छोटे से टापू की ओर चल पड़े. टापू पर पहुँचकर पंडित ने उस व्यक्ति से कहा, “नमस्ते जी, मैं आपको भजन सिखाने के लिए आया हूँ.” व्यक्ति ने जवाब दिया, “यह मेरा अहोभाग्य है, श्रीमान! कृप्या मुझे आपको पानी व भोजन परोसने का अवसर दें.”

पूरे तीन दिनों तक पंडित उस व्यक्ति को शिक्षित करते रहे. पंडित ने उसे शास्त्रों का ज्ञान दिया, विभिन्न प्रार्थनाओं का सही उच्चारण सिखाया और उसे आध्यात्मिक तथा सत्य पर आधारित कई कहानियाँ सुनाईं.

तीन दिनों तक इतना सब कुछ सीखने के बाद वह व्यक्ति बहुत खुश था. उसने पंडित से कहा, “श्रीमान, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! भगवान आपको सदा सुखी रखे! मैं आपसे प्रेम करता हूँ.”
और फिर नाव में बैठकर पंडित टापू से रवाना हो गए. जब पंडित नाव में जा रहे थे…….

………….. वह मूर्ख पानी के ऊपर से भागा.priest1

वह भागकर पंडित की नाव में आया और बोला, “श्रीमान, पंडित जी !! मैं एक चीज़ भूल गया. उस एक पंक्ति का क्या उच्चारण था???” हालाँकि पंडित स्तंभित थे कि वह व्यक्ति पानी पर चलकर आया था पर फिर भी किसी तरह से स्वयं को संभालकल उन्होंने जवाब दिया, “आ.. म…इसे कहते हैं………….” पंडित के द्वारा संशोधन करने पर मूर्ख बोला, “अरे हाँ! सही कहा!! हा, हा, हा!!!” और फिर पानी पर चलकर वह टापू वापस लौट गया.

उस व्यक्ति के व्यवहार से पंडित विनम्रता से भर गए. यधपि पंडित बहुत ज्ञानी थे परन्तु टापू पर यह उत्कृष्ट व्यक्ति ……और भी अधिक ज्ञानी था. उसके पास न केवल अशारीरिक शक्तियाँ थीं, बल्कि बहुत ही मधुर निष्ठा भी थी. पंडित ने सोचा, “यह व्यक्ति किसी भी तरह से मूर्ख नहीं है. इस व्यक्ति के समान सच्चे भक्त की तुलना में मैं एक मूर्ख हूँ….

गुरु कहते हैं,

वास्तविकता जानने से ही, हम सही मायने में सच्चे पंडित बनते हैं.

  सीख:
भगवान भक्त का ज्ञान व शाश्त्रों और प्रार्थनाओं में प्रवीणता नहीं बल्कि भक्त का प्रेम, सच्चाई व विनम्रता देखते हैं. प्रार्थनाओं का अभ्यास व बुद्धि का एक मात्र उद्देश्य स्वयं को रूपांतर करना तथा एक पवित्र व करुणामय हदृय का विकास करना है.

http://www.saibalsankaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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