एक कीमती शाल

 आदर्श : उचित आचरण

 उप आदर्श: विभेद

यह कहानी एक आनन्दभोगी राजा की है जो अत्यधिक शराब, विषय भोग तथा अन्य बुरी आदतों में लीन रहता था. shawl3वह अपने प्रधान मंत्री से कहता था, “मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलता है. इसलिए आर्थिक सुविधाओं तथा विषयी इन्द्रियों का अनुसरण करना चाहिए. जीवन का जी भरकर आनंद लेना चाहिए.” प्रधान मंत्री एक समझदार व शालीन व्यक्ति था. वह राजा की प्रतिकूल तथा असभ्य गतिविधियों को लेकर चिंतित रहता था और उसे राजा के स्वभाव से बहुत तकलीफ़ होती थी. हर संभव अवसर पर वह राजा को सलाह देने की कोशिश करता था. पर सब व्यर्थ था क्योंकि राजा को उसकी बात समझ में नहीं आती थी. जब राजा नशे में धुत्त होता था तब वह सही व गलत में पहचान नहीं कर पाता था. अतः अक्सर वह अपनी प्रजा से बुरा व्यवहार करता था. राजा की जनता सदा भय में रहती थीshawl4 पर चूँकि राजा बहुत ही निष्ठुर था, कोई भी राजा का विरोध करने की हिम्मत नहीं कर पाता था.

एक दिन, संयोग से, प्रधानमंत्री के किसी काम से राजा अत्यधिक प्रसन्न था. राजा ने उपहार के रूप में प्रधान मंत्री को एक बेशक़ीमती शाल भेंट की.shawl5 दरबार से निकलने के तुरंत बाद, प्रधान मंत्री ने उस शाल का प्रयोग अपनी नाक पोंछने के लिए किया. एक दरबारी जो प्रधान मंत्री से ईर्ष्या करता था और इस अनुचित भाव प्रदर्शन को देख रहा था, राजा के पास गया और बोला, “महाराज, प्रधानमंत्री ने आज बहुत ही निरादरपूर्ण भाव व्यक्त किया है.”shawl6

राजा ने पूछा, “क्या हुआ?”

दरबारी ने कहा, “महाराज ने प्रधानमंत्री को एक अनमोल शाल से सम्मानित किया था. लेकिन, उस शाल से अपना नाक पोंछकर प्रधानमंत्री ने आपका अनादर किया     है.” राजा ने तुरंत प्रधानमंत्री के लिए बुलावा भेजा. shawl7

राजा ने पूछा, “मेरे दिए हुए शाल से अपना नाक पोंछकर, मेरा अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?” प्रधानमंत्री ने सम्माननीय ढ़ंग से उत्तर दिया, “महाराज, मैंने तो केवल आपकी दी हुई सीख का अनुसरण किया है.” “मैंने तुम्हें अशिष्टता दिखाने की शिक्षा दी है?” राजा ने कठोरता से पूछा, “कैसे?” प्रधानमंत्री ने कहा, “आपको मनुष्य जीवन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जो कि इस शाल से कहीं अधिक अनमोल है. परन्तु आप शालीनता और नैतिकता का अपमान करते हुए अपना कीमती समय भौतिक सुविधाओं तथा विषयी इन्द्रियों में नष्ट करते हैं. आपके इसी आचरण से मैंने शाल का दुरपयोग करना सीखा है.”

इस बार प्रधानमंत्री का निशाना सही लगा. राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसकी ज़िन्दगी व साम्राज्य में सदा के लिए सुधार आ गया.  

        सीख :

हमें सही व गलत में भेद-भाव करना सीखना चाहिए. जब बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाता है तो वह बड़े होकर बुद्धिमान बनते हैं और एक सात्विक जीवन व्यतीत करते हैं.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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