सब हमारे भीतर ही है

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                   आदर्श : सत्य
              उप आदर्श : आत्मविश्लेषण

एक समय की बात है कि एक आकर्षक हिरणी थी deerजो दिनभर जंगल में उछलती-कूदती रहती थी. हर रोज़ उसे एक अद्भुत सुगंध महसूस होती थी. यह खुशबू बारिश या फूलों की महक से भी अच्छी थी.deer10 हिरणी को आश्चर्य होता था कि इतनी मनमोहक सुगंध कहाँ से आती है क्योंकि उसने ऐसी खुशबू इससे पहले कभी नहीं सूँघी थी. वह इसका पता लगाने के लिए हर तरफ सूँघने लगी. कभी उसे संदेह होता था कि खुशबू किसी वृक्ष से आ रही है, पर जब वह भागकर वहाँ पहुँचती थी तो उसे वह पेड़ किसी भी अन्य सामान्य पेड़ के समान प्रतीत होता था.deer2

हर जगह सूँघते हुए हिरणी इधर-उधर भटकने लगी. कभी वह सोचती, “क्या यह खुशबू तितलियों से आ रही है? deer3अरे नहीं….यह तो कहीं और से आ रही है.” कभी उसे अचरच होता कि वह सुगंध रोबिन पक्षी से आ रही है. deer4परन्तु सूँघने पर मालूम पड़ता कि वह गलत थी. यद्यपि उसे संदेह था पर एक बार को उसे शक हुआ कि शायद वह गंध दलदल से आ रही है.deer5 परन्तु जब वह दलदल के पास पहुँची तब उसे अहसास हुआ वह खुशबू वहाँ से भी नहीं आ रही थी. हिरणी ने गड्ढों में तथा झाड़ियों deer6में भी सूँघने की कोशिश की पर वह सुगंध इनमें से किसी में से भी नहीं आ रही थी.

हिरणी भागती व उछल-कूद करती रही और हर जगह इस मायावी खुशबू के स्त्रोत का पता लगाने की कोशिश करती रही. इस प्रकार प्रयास करते-करते हिरणी को कुछ समय बाद थकान महसूस होने लगी. पर हिरणी ने हिम्मत नहीं हारी. उसने सोचा, “मैं ढूँढ़ लूँगी. यह खुशबू कहीं से तो आ ही रही होगी.” पूर्णतः थक जाने के बावजूद हिरणी लगातार कोशिश करती रही और अपने आप में दोहराती रही, “मेरा शरीर जवाब देने लगा है पर मुझे यह पता लगाना होगा कि इतनी मनमोहक खुशबू कहाँ से आ रही है.” अंततः उसका शरीर बिलकुल बेजान सा हो गया और एकाएक वह ज़मीन पर गिर पड़ी.deer7

ज़मीन पर गिरने के बाद भी उसका दिमाग अपनी खोज जारी रखना चाहता था पर उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था. तभी अचानक उसे अपने आस-पास एक सुगंध महसूस हुई. “यही है! यही वह खुशबू है. मैं कब से यही ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी. मुझे पूरा विश्वास था कि यह खुशबू यहीं कहीं है. लेकिन यह कहाँ से आ रही है?” उसी क्षण हिरणी को कुछ बहुत अद्भुत महसूस हुआ, “अरे! यह तो मेरे अंदर से ही आ रही है. यह तो शुरू से ही मेरे अंदर थी.” हिरणी मुस्कुराई और चैन की नींद सो गई.deer8

यह खुशबू वास्तव में उसके स्वयं के अंदर से ही आ रही थी. भगवान भी ऐसे ही हैं. लोगों को लगता है कि भगवान कहीं बाहर हैं. परन्तु भगवान सर्वदा हमारे भीतर हैं; हमारे आस-पास हैं. वह हमसे दूर नहीं हैं. काफी देर व दूर तक खोजने के बाद हिरणी को अहसास हुआ कि जगत परमेश्वर सर्वदा उसके साथ ही थे.

सीख:

अगर हम आत्मविश्लेषण करेंगें तो हमें विश्वास होगा कि ईश्वर व शान्ति हमारे भीतर ही हैं पर हम उन्हें बाहर ढूँढ़ते रहते हैं.

गुरु राम दस ने कहा है, “मैं अपने भीतर आपके नाम के जाप की विनती करता हूँ और इसी नाम से दिन-रात मुझे शान्ति मिलती है.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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