ब्राह्मणी और नेवला

   आदर्श : उचित आचरण
 उप आदर्श : विभेदन

एक शहर में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था. ब्राह्मण की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया. ठीक उसी समय एक नेवले ने भी एक बच्चे को जन्म दिया. ब्राह्मणी ने नेवले के बेटे को गोद ले लिया nevla3और उसका लालन-पालन अपने बेटे के समान करने लगी. लेकिन फिर भी ब्राह्मणी अपने बेटे को नेवले के साथ कभी अकेला नहीं छोड़ती थी. ब्राह्मणी को नेवले पर भरोसा नहीं था और उसे डर था कि नेवला कभी भी उसके पुत्र को हानि पहुँचा सकता है. ऐसा कहा जाता है कि अपना सगा बेटा कितना भी चरित्रहीन, बदसूरत, मूर्ख व दुष्ट क्यों न हो, पर अपने माता-पिता का लाडला रहता है.

एक दिन ब्राह्मणी झील से पानी लेने गई और ब्राह्मणी के जाते ही घर में एक कोबरा घुस आया. ब्राह्मणी के पुत्र की रक्षा करने के लिए नेवले ने साँप पर हमला कियाnevla1 और उसे मार डाला. अपनी माँ, ब्राह्मणी, के पैरों की आहट सुनकर खून से लिपटा हुआ मुँह लेकर नेवला माँ का स्वागत करने गया. nevla2जब माँ ने देखा कि नेवले के मुँह से खून बह रहा है तो उसने सोचा कि जिस बात का उसे डर था वही हुआ है. और बिना कुछ सोचे-समझे, ब्राह्मणी ने नेवले पर पानी का घड़ा फेंका, जिससे नेवले की मृत्यु हो गई.

भयभीत ब्राह्मणी जब घर के अंदर गईnevla तो उसने अपने पुत्र को पालने में गहरी नींद में सोते हुए पाया. पास में एक लहू-लुहान कोबरा मरा पड़ा था. ब्राह्मणी शोक व पश्चाताप से भर गई कि उसने अपने बेटे समान नेवले को मार डाला था.nevla4

सीख :

ज्ञानी व्यक्तियों ने कहा है कि जो अपने काम विचारशीलता से नहीं करते हैं उन्हें, ब्राह्मणी की तरह, अपने कर्मों पर पछतावा करना पड़ता है. जल्दबाज़ी से सदा हानि ही होती है. हमें सोच-विचार कर ही हर कार्य करना चाहिए.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक – अर्चना

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