दैवत्व तथा अहम्

divinity

            आदर्श : उचित आचरण

उप आदर्श : सभी में दैवत्व देखें

उत्तंग नाम के एक धर्मपरायण संत थे जो मानवता के कल्याण के लिए तपस्या कर रहे थे. उत्तंग जाति से ब्राह्मण थे और भगवान कृष्ण के परिचित थे. वह इच्छा, अभिलाषा, घृणा व लोभ से विमुक्त, एक बंजारे का जीवन व्यतीत करते थे; वह अपनी अलग ही दुनिया में रहते थे.

भगवान कृष्ण उत्तंग की तपस्या से अति प्रसन्न थे. उन्होंने उत्तंग को न केवल अपना विराट स्वरुप दिखायाdivinity1 बल्कि कृष्ण उन्हें एक वरदान भी देना चाहते थे. संत उत्तंग ने कृष्ण से कहा कि वह इच्छारहित हैं और इसलिए उन्हें कुछ नहीं चाहिए. परन्तु उत्तंग की तपस्या के लिए उन्हें इनाम के रूप में वरदान देने के लिए कृष्ण ज़िद करते रहे. अतः भगवान कृष्ण के लगातार आग्रह करने पर उत्तंग ने वर माँगा कि जब भी उन्हें पानी की आवश्यकता हो या जब भी वह प्यासे हों तब उनके लिए पानी उपलब्ध होना चाहिए. उत्तंग को वरदान देकर भगवान कृष्ण अंतर्ध्यान हो गए.

रेगिस्तान में एक दिन बहुत लंबा चलने के बाद संत उत्तंग को प्यास लगी परन्तु पानी का कहीं नामोनिशान नहीं था.divinity3 तब उन्हें भगवान कृष्ण का दिया वरदान याद आया. वरदान का ध्यान आते ही, उन्होंने फटे हुए कपड़े पहने एक शिकारी को एक भीषण कुत्ते के साथ देखा. divinity4शिकारी ने चमड़े की थैली में पानी रखा हुआ था और उसने संत से पूछा, “महाशय, क्या आप पानी पीयेंगें?” संत एक पक्के ब्राह्मण थे इसलिए शिकारी की अवस्था देखकर उन्हें घृणा महसूस हुई. संत ने नम्रता से इंकार किया, “नहीं, शुक्रिया.” शिकारी एक बार पुनः संत के निकट गया परन्तु संत ने अत्यंत गुस्से में और चिढ़कर शिकारी से चले जाने को कहा. संत के ऐसा कहते ही कि उन्हें पानी में कोई रूचि नहीं है, वह शिकारी और कुत्ता ओझल हो गए.

ऐसा देखकर संत तुरंत समझ गए कि वह भगवान थे जो भेष बदलकर उनकी प्यास बुझाने आए थे. संत को ठेस तो पहुँची पर उन्हें आश्चर्य भी हुआ कि भगवान कृष्ण एक निचली जाति के व्यक्ति द्वारा उनके लिए पानी कैसे भेज सकते हैं. संत चकित थे कि कृष्ण ने कैसे आशा कर ली कि संत एक चमड़े की थैली में से पानी ग्रहण करेंगें.divinity5

इसी दौरान, भगवान कृष्ण प्रकट हुए,divinity2 मुस्कुराए और उन्होंने संत से पूछा, “चांडाल कौन था? मैंने तो इंद्र देव से पानी ले जाने के लिए कहा था. परन्तु वास्तविकता में, तुम्हें अमर बनाने के लिए, वह पानी की जगह अमृत लेकर आए थे. वह केवल तुम्हें परखना चाहते थे यदि तुम सबमें दैवत्व देख सकते हो. और इसके लिए इंद्र को मैंने अनुमति दी थी.”

संत उत्तंग समझ गए कि वह परीक्षा में असफल रहे. अपने अहम् के कारण उन्होंने इंद्र देव द्वारा पानी के रूप में लाए अमृत को ठुकरा दिया था.

अगर उत्तंग जैसे ऋषि परीक्षा में विफल हो सकते हैं, तो हम क्या चीज़ हैं? क्या हम भगवान की माया या लीला समझने योग्य हैं? इसलिए हमें सदा सतर्क रहकर, जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिए. भगवान हमेशा हमारी परीक्षा लेते हैं. वह सदा हमारा भला करते हैं. वह जो भी करते हैं, वह हमारे अच्छे के लिए ही होता है. ईश्वर की करनी कभी प्रतिकूल नहीं होती है.

  सीख:

हम सब एक हैं. हम सबका एक ही स्त्रोत है. जब हमें इसका अहसास हो जाएगा और हम सभी में दैवत्व देखने लगेंगें तो हम अंदर से अति प्रसन्न रहेंगें.divinity8

   सर्वदैवत्वा स्वरूपं

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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