कुम्हार और चिकनी मिट्टी

potter

आदर्श : उचित आचरण
 उप आदर्श : धैर्य, सहनशीलता

एक दम्पति की कहानी बताई जाती है जो अपनी शादी की २५वीं सालगिरह मनाने इंग्लैंड गए. वहाँ दोनों एक दुकान में खरीदारी करने गए, जहाँ पुराकालीन चीज़ें मिलतीं थीं. उन दोनों को पुरानी मिट्टी की वस्तुऐं पसंद थीं, खासतौर से चाय का कप. उन्होंने एक विशिष्ट और आकर्षक प्याला देखा potter4और दुकान में महिला से आग्रह किया, “क्या हम वह देख सकते हैं? हमने ऐसा ख़ूबसूरत प्याला पहले कभी नहीं देखा है!”

जैसे ही उस महिला ने दम्पति को प्याला दिया, वह प्याला एकदम से बोला…….”तुम समझते नहीं हो.” “मैं हमेशा से चाय का प्याला नहीं हूँ. एक समय था जब मैं केवल लाल मिट्टी का ढेला था. मेरे मालिक ने मुझे अनेकों बार लपेटा, कूटा और थपथपाया और मैं हर बार चिल्लाया, “ऐसा मत करो. मुझे पसंद नहीं है. मुझे अकेला छोड़ दो.” परन्तु वह केवल मुस्कुराया और नरमी से बोला,”अभी नहीं !!” और फिर धाड़! मुझे चक्के पर रख दिया गया potter wheelऔर मैं गोल, गोल, गोल घूमता गया. “रोको! मुझे चक्कर आ रहे हैं. मैं बीमार पड़ जाऊँगा!” मैं चिल्लाया.

लेकिन मास्टर ने केवल सर हिलाया और धीरे से कहा, “अभी नहीं.”

उसने मुझे न केवल घुमाया और कुरेदा बल्कि अपनी पसंद के अनुसार कोंचा भी potter1और मेरा आकार तोड़-मरोड़ दिया. इस के बाद उसने मुझे भट्ठी में डाल दिया जहाँ मुझे अत्यधिक गर्मी महसूस हुई. मैं चिल्लाया और मैंने दरवाज़े पर खटखटाकर धम धम प्रहार किया.
“बचाओ! मुझे यहाँ से बाहर निकालो!” ‘अभी नहीं!’ जब मुझे लगा कि मैं और सहन नहीं कर पाऊँगा, दरवाज़ा खुला. उसने मुझे सावधानी से बाहर निकाला और ताक़ पर रख कर ठंडा होने के लिए छोड़ दिया.potter3
ओह, कितना अच्छा महसूस हो रहा था. “आह, यह पहले से कहीं अच्छा है, ” मैंने सोचा. परन्तु जब मैं ठंडा हो गया तो मास्टर ने मुझे उठाया और मुझे झाड़ पोंछ कर हर तरफ से रंग दिया. रंग की तेज़ गंध से निकला धुँआ भयंकर था…”अरे, रोको! रोको! ” मैं चिल्लाया. पर मास्टर ने केवल सर हिलाया और कहा, “अभी नहीं……”
और फिर एक बार पुनः उसने मुझे भट्ठी में डाल दिया. पर इस बार पहले बार की तरह नहीं था. इस बार पहली बार की अपेक्षा दुगना गरम था potter2और मुझे विश्वास था कि मेरा दम घुट जाएगा. मैंने विनती की….मैंने निवेदन किया….मैं चिल्लाया….. मैं रोया…. मुझे यकीन था कि मैं झेल नहीं पाऊँगा. मैं हार मानने को तैयार था पर तभी दरवाज़ा खुला और उसने मुझे बाहर निकालकर पुनः ताक़ पर रखा. ताक़ पर पड़े- पड़े मैं ठंडा हुआ और इंतज़ार करते-करते अचरज में था, “यह मेरे साथ आगे क्या करने वाला है?”

एक घंटे बाद उसने मुझे शीशा दिया और कहा, “अपने आप को देखो.”

और मैंने देखा….मैंने कहा, “यह मैं नहीं हूँ. मैं यह हो ही नहीं सकता. यह बहुत सुन्दर है.”
वह धीरे से बोला, “अब मैं चाहता हूँ कि तुम याद रखो, ” उसने आगे कहा, “मुझे पता है कि घुमाने, कुरेदने व कोंचने से तुम्हें दर्द हो रहा था लेकिन अगर मैं तुम्हें अकेला छोड़ देता तो तुम सूख गए होते. मुझे मालूम है कि चाख पर तुम्हें चक्कर आ रहे थे पर अगर मैंने रोक दिया होता तो तुम चूर-चूर हो गए होते. यद्यपि तुम्हें तकलीफ़ हुई और भट्ठी बहुत गरम व कष्टपूर्ण थी, पर यदि मैंने तुम्हें वहाँ नहीं रखा होता तो तुम फट गए होते. जब मैंने तुम्हें हर तरफ से रगड़ा और रंगा तब यद्यपि तुम्हें पसंद नहीं था पर तुम्हें सख्त व मज़बूत बनाने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा. अन्यथा तुम्हारे जीवन में कोई रंग नहीं होता.”

“और अगर मैंने तुम्हें भट्ठी में दूसरी बार नहीं रखा होता तो तुम लम्बे समय तक रह पाने के लिए इतने मज़बूत नहीं बन पाते. अब तुम एक तैयार वस्तु हो. अब तुम वैसे हो, जैसी मैंने शुरूआत में कल्पना की थी.”

 सीख:

खुद को ढालने के लिए अपने प्रभु- भगवान/गुरु/मार्गदर्शक पर विश्वास रखो. उनको मालूम है कि तुम्हारे लिए क्या सर्वोत्तम है.
कठिन परिश्रम तथा मुसीबतों व कठिनाइयों में  दृढ़ रहकर हम जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं. हमें अपना उद्देश्य ध्यान में रखना चाहिए और हार माने बिना अपना कार्य करते रहना चाहिए.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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