अहंकारी लाल गुलाब

rose

आदर्श : उचित आचरण

  उप आदर्श : विवेक

एक ख़ूबसूरत बसंत के दिन जंगल में एक लाल गुलाब खिला. उस जंगल में विभिन्न प्रकार के पेड़ व पौधे उगते थे. rose3जैसे गुलाब ने इधर-उधर देखा, पास के देवदार के वृक्षrose2 ने कहा, “कितना सुन्दर फूल है. काश मैं भी इतना आकर्षक होता.” एक अन्य पेड़ ने कहा, “प्रिय देवदार, उदास मत हो. हमें सब कुछ नहीं मिल सकता है.”

गुलाब ने अपना सर घुमाया और टिप्पणी की, “ऐसा लगता है कि मैं इस जंगल का सबसे सुन्दर पौधा हूँ.” एक सूर्यमुखी ने अपना पीला सर उठाया और कहा, “तुम ऐसा क्यों कहते हो? इस वन में बहुत सारे आकर्षक पौधे हैं. तुम केवल उनमें से एक हो.” लाल गुलाब ने उत्तर दिया, “मैं देख रहा हूँ कि सब मेरी ओर देख रहे हैं और मुझे सराह रहे हैं.” फिर गुलाब ने कैक्टस की ओर देखा और कहा, “काँटों से भरे उस बदसूरत पौधे को देखो.”rose1 देवदार के पेड़ ने कहा, “लाल गुलाब, यह तुम क्या कह रहे हो. कौन कह सकता है कि सुंदरता क्या है? काँटे तुममें भी हैं.”

घमंडी लाल गुलाब ने देवदार की ओर गुस्से से देखा और कहा, “मुझे लगा था कि तुम्हारी पसंद अच्छी है! पर तुमको तो पता ही नहीं है कि खूबसूरती क्या होती है. तुम मेरे काँटों की तुलना कैक्टस के काँटों से कैसे कर सकते हो?”

“कैसा अहंकारी फूल है,” वृक्षों ने सोचा.

गुलाब ने अपनी जड़ें कैक्टस के पास से दूर करने की बहुत कोशिश की पर वह हटा नहीं पाया. जैसे-जैसे दिन बीतते गए, लाल गुलाब कैक्टस की ओर देखकर अपमानजनक बातें कहता था: “यह पौधा व्यर्थ है. कितने दुःख की बात है कि मैं इसका पड़ोसी हूँ.”

कैक्टस कभी परेशान नहीं हुआ. उसने गुलाब को सलाह देते हुए कहा, “भगवान ने जीवन का कोई भी रूप बिना किसी उद्देश्य के नहीं बनाया है.”

बसंत ऋतु बीत गई और मौसम बहुत गरम हो गया. वन में जीवन कठिन हो गया क्योंकि पौधों व पशुओं को पानी चाहिए था और बारिश नहीं हो रही थी. लाल गुलाब मुरझाने लगा. फिर एक दिन गुलाब ने देखा कि गौरैया कैक्टस में अपनी चोंच मारती और तरोताज़ा होकर उड़ जा रही थी.rose5यह रहस्मय था. अतः लाल गुलाब ने देवदार के पेड़ से पूछा कि पंछी क्या कर रहे थे. देवदार के पेड़ ने समझाया कि पंछी कैक्टस से पानी लेते हैं. “पर जब वे छेद करते हैं तो दर्द नहीं होती है?” ,गुलाब ने पूछा.

“हाँ, पर कैक्टस को किसी भी पक्षी को कष्ट झेलते देखना पसंद नहीं है” , देवदार ने उत्तर दिया.

गुलाब ने आश्चर्यचकित होकर अपनी आँखें खोलीं और पूछा, “कैक्टस में पानी होता है?”

“हाँ, तुम भी उससे पानी पी सकते हो. अगर तुम कैक्टस से मदद के लिए कहोगे तो गौरैया तुम्हारे लिए पानी ला सकती है.”

कैक्टस से पानी माँगने के लिए लाल गुलाब अपने पिछले शब्दों व व्यवहार पर बहुत शर्मिंदा था. परन्तु अंततः उसने कैक्टस से मदद माँगी. कैक्टस दयापूर्वक सहमत हो गया और पंछियों ने अपनी चोंच में पानी भरकर गुलाब की जड़ों को पानी दिया.

इस तरह गुलाब ने सबक सीखा और दुबारा कभी किसी को उनके रंग-रूप से नहीं आँका.

सीख:

कभी भी किसी को उनके भेष से मत पहचानो. रंग-रूप भ्रमकारी होते हैं. हम किसी को केवल उनके कार्यों से ही जान सकते हैं ना कि उनके रूप से.

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http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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