नूडल्स का प्याला

noodles

   आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : अपने माता-पिता के प्रति प्रेम व आदर

उस रात, सु का अपनी माँ के साथ झगड़ा हुआ noodles1और फिर गुस्से में सु घर से बाहर चली गई. रास्ते में उसे ध्यान आया कि उसकी जेब में पैसे नहीं हैं. उसके पास घर पर फ़ोन करने के लिए पर्याप्त सिक्के भी नहीं थे.

उसी समय वह नूडल्स की एक दुकान के पास से गुज़री. noodles2खाने की मधुर सुगंध से उसे अचानक बहुत ज़ोर से भूख लगी. उसे नूडल्स खाने की बहुत इच्छा हुई पर उसके पास पैसे नहीं थे.

दुकानदार ने उसे काउंटर पर कुछ हिचकिचाते हुए खड़े देखा और पूछा, “अरे छोटी, क्या तुम एक कटोरा नूडल्स खाओगी?”
पर….पर मेरे पास पैसे नहीं हैं…उसने संकोच करते हुए उत्तर दिया.
ठीक है, मैं तुम्हें दावत देता हूँ…दुकानदार ने कहा- अंदर आओ, मैं तुम्हारे लिए नूडल्स बनाता हूँ.

कुछ देर बाद दुकानदार सु के लिए गरमागरम नूडल्स का प्याला लेकर आया. noodles3थोड़ा खाने के बाद, सु रो पड़ी.

क्या हुआ? – दुकानदार ने पूछा.
कुछ नहीं. आपकी अनुकम्पा से मैं बहुत प्रभावित हूँ – सु ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा.
सड़क पर एक अनजान भी मुझे नूडल्स का कटोरा देता है और मेरी माँ ने झगड़ा करके मुझे घर से बाहर निकाल दिया. वह निष्ठुर हैं.

दुकानदार ने गहरी साँस ली :
बेटा, तुम ऐसा क्यों सोचती हो? दोबारा सोचो. मैंने तो तुम्हें सिर्फ नूडल्स का एक प्याला दिया है और तुम्हें कृतज्ञता महसूस हो रही है. तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचपन से पाला है. तुम उनके प्रति आभारी क्यों नहीं हो? तुमने उनकी अवज्ञा क्यों की?

ऐसा सुनने पर सु वास्तव में हैरान थी.

“मैंने ऐसा क्यों नहीं सोचा? एक अजनबी से मिले नूडल्स के एक कटोरे ने मुझे इतना एहसानमंद महसूस कराया. मेरी माँ ने बचपन से मेरी देखभाल की है और मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ, ज़रा भी नहीं.”noodles4

घर लौटते समय, सु ने मन में सोचा कि वह घर पहुँचने पर अपनी माँ से क्या कहेगी: “माँ, मैं शर्मिंदा हूँ. मुझे पता है कि गलती मेरी है, मुझे कृपया क्षमा कर दो….”
सीढ़ियाँ चढ़ने पर, सु ने अपनी माँ को चिंतित देखा. सु को हर जगह खोजकर वह थक चुकीं थीं. सु को देखने पर, माँ ने कोमलता से कहा, “सु, अंदर आओ बेटा. तुम शायद बहुत भूखी होगी? मैंने चावल बनाए हैं और खाना पहले से ही बनाकर रखा है. तुम गरम-गरम खाना खा लो…….”

सु से और नियंत्रण नहीं हुआ और वह अपनी माँ की बाहों में रोने लगी.

जीवन में हम अपने आस-पास के लोगों की छोटी-सी करनी को भी आसानी से सराह देते हैं पर अपने सगे-संबंधियों, ख़ास-तौर से अपने माता-पिता के बलिदानों को स्वाभाविक मान लेते हैं.

   सीख :

अभिभावकीय प्रेम व सहानुभूति सबसे अधिक उत्कृष्ट उपहार है जो हमें जन्म से ही दिया गया है.

हमारा पालन-पोषण करने के लिए माता-पिता हमसे कोई भी अपेक्षा नहीं करते हैं…..पर क्या हमने अपने माता-पिता के बशर्ते बलिदान को कभी सराहा है?

अपने माता-पिता से प्रेम करो और उनका आदर करो. उनके बिना हमारा अस्तित्व नहीं है.noodles5

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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