शालुक की जीत

 आदर्श : प्रेम
  उप आदर्श : श्रद्धा

गुजरात के महूदी नामक गॉंव में, मेशवो नदी के उपजाऊ तट shalukपर जीवनभाई नाम का एक गरीब किसान रहता था. जीवनभाई एक प्रकार का ख़रबूज़ा उगाता था जिसे चिबुद कहते हैं.shaluk3 उसकी पत्नी, केसरबाई तथा बेटा, शालुक भी उसकी मदद करते थे.

एक बार शालुक ने अपनी माँ, केसरबाई से कहा, “माँ, मैं चाहता हूँ कि श्री महाराज हमारा एक रसीला चिबुद चखें. क्या मैं एक उनके लिए ले जाऊँ?” “अगर महाराज हमारा चिबुद खायेंगें तो यह हमारा सौभाग्य होगा.”

अगले दिन शालुक ने नदी के तट से सबसे सुन्दर व पका हुआ चिबुद तोड़ा और महाराज को फल देने चल पड़ा. shaluk2

जल्द ही उसे चिबुद खाने का मन होने लगा; उसके मुहँ में पानी आने लगा और उसने सोचा, “अमीर भक्तों द्वारा भेंट किए गए स्वादिष्ट व पौष्टिक भोजन की तुलना में हमारा यह सस्ता फल क्या महाराज वास्तव में स्वीकार करेंगें? चलो मैं इसे स्वयं ही खा लेता हूँ.”

जल्द ही उसके विचार इतने ढृढ़ हो गए कि वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और उसने अपने थैले में से चाकू निकाला. जैसे ही वह फल काटने लगा, उसे एक और विचार आया. यह भाव उसके हृदय से आता प्रतीत हो रहा था. “शालुक, तुम कितने कमज़ोर हो.” जिस फल को तुम महाराज को देना चाह रहे हो, तुम उसे स्वयं कैसे खा सकते हो? महाराज के प्रति तुम्हारी महान श्रद्धा का क्या हुआ?”

महाराज के प्रति शालुक की तीव्र निष्ठा ने उसे झिंझोड़ दिया. अतः उसने अपने मन से कहा, “अब सुनो, यह चिबुद महाराज के लिए है.”और दृढ़ मत होकर वह पुनः चलने लगा.

कुछ समय बाद पैदल चलने ने शालुक को प्यासा और भूखा कर दिया और उसका मन फिर से चंचल हो गया. “बेवकूफ, चिबुद खा ले. ऐसी तुच्छ व छोटी सी चीज़ में महाराज को दिलचस्पी नहीं होगी. अमीर भक्त उन्हें कहीं बेहतर खाना देंगें. फटा फट खा ले और घर लौट जा.”

लालच ने नन्हे शालुक को वशीभूत कर लिया. जैसे ही उसने चाकू निकालने के लिए अपना हाथ थैले में डाला, उसे फिर से अपने भीतर से एक आवाज़ सुनाई पड़ी, “नहीं शालुक! तुम महाराज के सच्चे बाल भक्त हो. अपने मन की मत सुनो.”

“अब यह सुनिश्चित है,” शालुक ने स्वयं से दृढ़ता से कहा, “मैं चिबुद नहीं खाऊँगा. यह महाराज के लिए है. स्वामी नारायण! स्वामी नारायण!” जैसे ही उसने इस   दिव्य मन्त्र का जाप करना शुरू किया, उसका ध्यान महाराज की उत्कृष्ट छवि पर केंद्रित होने लगा. shaluk4वह तेज भागने लगा और लगातार जाप करता रहा, “स्वामी नारायण! स्वामी नारायण!”

शीघ्र ही वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ महाराज सभा में बैठे हुए थे और परमहंस कीर्तन कर रहे थे. महाराज की पवित्र छवि देखकर शालुक मंत्रमुग्ध था. शालुक को देखकर सर्वज्ञानी महाराज उसके भाव तुरंत जान गए और उन्होंने इशारे से शालुक को अपने पास बुलाया. शालुक का दिल ख़ुशी के कारण ज़ोर से धड़के लगा. वह महाराज की ओर भागा और उनके चरणों में गिर गया. फिर खड़े होकर उसने अत्यंत श्रद्धा व विनम्रता से चिबुद महाराज की गोद में रखा.

तब महाराज बोले, “शालुक, अपने थैले में से मुझे वह चाकू दो. मैं इस चिबुद को अभी खाना चाहता हूँ.”
महाराज ने चिबुद खाना शुरू किया और सारा ख़त्म कर दिया. वहाँ उपस्थित सभी जन आश्चर्यचकित थे और शालुक के मनोभाव पर हैरान थे. सभा को कुछ बताने से पहले, महाराज ने शालुक को बर्फी का मटका देकर उसे गले लगाया.

इस दृश्य को देखकर समस्त सभाजन जोर-जोर से ताली बजाने लगे. अब सब लोग यह जानने को व्याकुल व उत्सुक थे कि इस नन्हे बालक पर महाराज इतनी खुशी व कृपा क्यों बरसा रहे थे.

अंततः महाराज बोले, “इस नन्हे बालक ने चिबुद यहाँ तक लाने के लिए अपने मन से संघर्ष किया है. इसने लालच का बहादुरी से सामना किया और कई बार “घायल” भी हुआ. पर इसने हार नहीं मानी और विजय हासिल की. भगवान और उनके साधु सदा उनकी मदद करते हैं जो अपने मन से संघर्ष करते हैं.”

सभी को अहसास हुआ कि महाराज ने सारा चिबुद स्वाद के लिए नहीं बल्कि शालुक की तीव्र व हार्दिक श्रद्धा संतुष्ट करने के लिए खाया था.

सभी ने शालुक की प्रशंसा की, “शाबाश शालुक! अपने मन को पराजित कर के, तुमने सारे संसार पर जीत हासिल की है.”

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s