सुनहरी खिड़की वाला घर – जो तुम्हारे पास है उसे संजो कर रखो

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आदर्श : उचित आचरण
    उप आदर्श : संतोष, कृतज्ञता

एक पहाड़ी पर एक छोटे, अति साधारण, गरीब घर में एक नन्ही लड़की रहती थी. जैसे वह थोड़ी बड़ी हुई, वह एक छोटे-से बगीचे में खेलती थी. house2जैसे वह और बड़ी हुई, वह बगीचे के घेरे के आगे घाटी के उस पार पहाड़ी की उँचाई पर एक अत्युत्तम घर को देख सकती थी. इस घर की सुनहरी खिड़कियाँ थीं- इतनी सेनहारी व चमकीली कि वह नन्ही लड़की स्वप्न देखते थी कि उसके सामान्य घर के बजाय सुनहरी खिड़कियों वाले घर में बड़ा होना और रहना कैसा जादुई होगा.
हालाँकि वह अपने माता-पिता तथा परिवार से प्यार करती थी,पर फिर भी वह ऐसे सुनहरे घर में रहने को तरसती थी और दिन भर कल्पना करती थी कि वहाँ रहना कितना अद्भुत व रोमांचक होगा.house

जब वह थोड़ी और बड़ी हुई और उसने बगीचे के घेरे के बाहर जाने के लिए पर्याप्त योग्यता व समझ पा ली तब उसने अपनी माँ से पूछा यदि वह द्वार से बाहर, गली में साइकिल चलाने जा सकती है. माँ से अनेको बार विनती करने पर, आखिरकार माँ ने उसे जाने की इज़ाज़त दे दी पर आगाह किया कि वह घर के इर्द-गिर्द ही रहे और ज़्यादा दूर न जाए. वह एक ख़ूबसूरत दिन था और उस बालिका को ठीक पता था कि वह कहाँ जा रही है. गली में घाटी के उस पार, उसने साइकिल तब तक चलाई जब तक वह दूसरी पहाड़ी के उस पार सुनहरे घर के द्वार तक न पहुँच गई.house3

जैसे ही वह साइकिल से नीचे उतरी और साइकिल को द्वार के खम्बे के सहारे खड़ा किया, उसने उस घर तक जाने वाले पथ पर ध्यान केंद्रित किया और फिर घर पर…और उसे यह जानकार बहुत निराशा हुई कि सभी खिड़कियाँ सादी व गन्दी थीं, जो सिर्फ घर के प्रति लापरवाही दर्शा रहीं थीं.

उदास होकर वह और आगे नहीं बढ़ी और वापस मुड़ गई. अत्यंत दुखी मन से वह अपनी साइकिल पर पुनः सवार हुई… और जैसे ही उसने ऊपर देखा उसने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने उसे चकित कर दिया…उसकी तरफ की घाटी के रास्ते के दूसरी ओर एक छोटा सा घर था और उसकी खिड़कियाँ सुनहरी चमक रहीं थीं….उसके छोटे से घर पर सूरज की रोशिनी चमकने के कारण.

तब उसे समझ में आया कि वह अपने सुनहरे घर में रह रही थी और वहाँ मिले सारे प्यार व देखभाल ने उस घर को ‘सुनहरा घर’ बनाया था. उसके द्वारा कल्पना की गई सारी चीज़ें वहीँ उसके सामने थीं.

              सीख :

हमें और अधिक की अभिलाषा करने के बदले अपने वरदानों की गिनती करना सीखना चाहिए. वह कहावत कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’- सदा सत्य नहीं प्रमाणित होती है. हमें हमारी आस-पास की चीज़ों को बहुमूल्य्ता से तथा संजो कर रखना चाहिए.

थोड़े और आध्यात्मिक अर्थ में, हमारे पास ‘प्रभु के लिए प्रेम’ की सबसे बड़ी पूँजी है और हम फिर भी संसार में अस्थायी ख़ुशी की तलाश में रहते हैं.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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