भगवान कहाँ हैं?

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आदर्श : सत्य

उप आदर्श : चेतना

एक बार एक जिज्ञासु भक्त ने सिद्ध संतwhere God से पूछा, “भगवन, ईश्वर का क्या रूप है? वे कहाँ रहते हैं और मैं उन्हें कहाँ खोज सकता हूँ? ”

संत बोले, “ईश्वर हर जगह हैं और सर्वव्यापी हैं. ईश्वर आनंद, सर्वज्ञ तथा अनश्वर हैं और तुम स्वयं भी ईश्वर हो.” भक्त ने पूछा, “अगर ऐसा है तो मैं उन्हें महसूस तथा अनुभव क्यों नहीं कर सकता?” संत ने उत्तर दिया, “चूँकि ईश्वर सर्वव्यापी हैं, वह तुम्हारे स्वयं के मन में हैं पर तुम्हारा मन उनमें नहीं है. तुम्हारा दिल संसार में तल्लीन हैं.”

संत ने कई भिन्न तरीकों से उसे भगवान के अस्तित्व के बारे में समझाने की चेष्टा की पर वह भक्त ईश्वर को समझ नहीं पा रहा था. तब संत ने उससे कहा, “हरिद्वार जाओ, वहाँ पर गंगा हैwhere God2 जिसमें एक अनोखी रंग की मछली है जो मनुष्यों की आवाज़ में बोल सकती है. वह मछली तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उचित उत्तर देगी.”

जिज्ञासु भक्त ने संत को प्रणाम किया, उनके पाँव छूए और हरिद्वार के लिए निकल पड़ा. वहाँ नदी के किनारे बैठकर वह उस अनोखी मछली के आने का इंतज़ार करने लगा.  जब भी वह कोई मछली देखता था तो अपना प्रश्न दोहराता था और पूछता था कि भगवान कहाँ रहते हैं और वह उन्हें कैसे देख सकता है? कुछ समय बाद अनोखी मछली आई where God4और उसने भक्त से पूछा, “तुम कहाँ से आए हो?” भक्त ने उत्तर दिया, “मुझे एक साधू ने तुमसे मिलने को कहा था और मैं जानना चाहता हूँ कि भगवान कहाँ रहते हैं तथा मैं उन्हें कैसे देख सकता हूँ?” मछली ने भक्त से कहा, “मैं पिछले सात दिनों से प्यासी हूँ. तो तुम मुझे बताओ कि मुझे पानी कहाँ से मिल सकता है.”

मछली की बात सुनकर भक्त हँसा और बोला, “अरे मूर्ख! पानी तुम्हारे ऊपर है, नीचे है, वह तुम्हारे दायें है, तुम्हारे बायें है और तुम्हारे हर तरफ पानी है.”
भक्त के इस प्रकार बोलने पर मछली गंभीर हो गई और बोली, “अरे, मासूम भक्त! तुम भी मेरी तरह मूर्ख हो! भगवान, जिन्हें तुम खोज रहे हो, वह तुम्हारे ऊपर हैं, नीचे हैं, तुम्हारे दायें हैं और बायें हैं. संक्षेप में, वह तुम्हारे हर तरफ हैं.”where God1

भक्त कुछ संतुष्ट हुआ और बोला, “अगर ऐसा है तो मैं आनंदमय प्रभु को देखने में असमर्थ क्यों हूँ और मैं इतना दुखी क्यों हूँ?” मछली बोली, “मेरा भी यही प्रश्न है. अगर मेरे हर तरफ पानी है, तो फिर मेरी प्यास क्यों नहीं बुझती है.”

भक्त मछली के शरीर की बनावट को जानता था. उसे ज्ञात था कि जब तक मछली अपना मुँह ऊपर रखकर सीधे तैरती है, उसके मुँह में पानी नहीं घुस सकता है. अपनी प्यास बुझाने के लिए मछली को उलटा होकर तैरना पड़ता है. अगर मछली के शरीर की बनावट इस प्रकार नहीं बनी होती तो पानी बिना रोक-टोक के उसके शरीर में घुस सकता था और मछली की मृत्यु हो जाती. अतः भक्त ने मछली को सुझाव दिया कि अपनी प्यास बुझाने के लिए वह उल्टी पलटे.

तब मछली ने भक्त से कहा, “जैसे हमें अपनी प्यास बुझाने के लिए पलटना पड़ता है, भगवान को देखने के लिए तुम्हें भी मुड़ना चाहिए. प्रभु को देखने के लिए स्वयं को इच्छाओं से दूर रखो. अन्य शब्दों में, जब तुम अपने मन के विचारों के प्रवाह को संसार से मोड़कर आनंदमय सर्वज्ञ ईश्वर की ओर लगाओगे, तब तुम्हारे सारे दुखों का अंत हो जाएगा. भक्त ने तदानुसार किया और अपने वास्तविक स्वरुप को समझ पाया.

सीख:

जब हम अपना मन भगवान की ओर मोड़ते हैं तब हम उन्हें पा सकते हैं. इसके साथ ही, भगवान की हर संरचना में हमें उन्हें देखना चाहिए.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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