सूफी संत – क्या मैं भगवान को देख सकता हूँ?

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         आदर्श : उचित आचरण
  उप आचरण : दोषों पर नियंत्रण

एक पहाड़ के ऊपर एक सूफी संत रहते थे. महीने में एक बार वे पहाड़ की तराई में स्थित एक गाँव में आया करते थे. S mएक बार एक आदमी उनके पास आया और उसने पूछा, “मुझे भगवान के दर्शन क्यों नहीं होते? क्या आप भगवान को देखने में मेरी मदद कर सकते हैं?”s m 1

“अवश्य”, सूफी संत का जवाब था, परन्तु उसके लिए तुम्हें मेरी सहायता करनी होगी.

“आपको क्या मदद चाहिए, महाशय?”

“तुम्हें एक समान माप व वज़न के पाँच पत्थर चुनने होंगें. s m 3उन्हें पहाड़ की शिखर पर लेकर जाओ ताकि मैं अपनी कुटिया के बाहर एक चबूतरा बनाने में उनका प्रयोग कर सकूँ.”
जिज्ञासु सहमत हो गया. दोनों ने पहाड़ के शिखर की यात्रा आरम्भ की. जल्द ही वह व्यक्ति थक गया और आगे चलना उसके लिए कठिन कार्य हो गया.

“एक पत्थर फेंक दो,” सूफी संत ने कहा, “फिर तुम्हारे लिए चलना आसान हो जाएगा.”

उस व्यक्ति ने एक पत्थर फेंक दिया और अब उसके लिए चलना आसान हो गया. कुछ समय बाद, एक बार फिर वह आदमी थक गया. पहाड़ की छोटी की ओर चलना बहुत कठिन हो रहा था. संत ने एक बार पुनः उसे एक पत्थर फेंकने को कहा. इस तरह पहाड़ की छोटी तक पहुँचते-पहुँचते उसने सारे पत्थर फेंक दिए थे. सूफी संत ने तब उस व्यक्ति से कहा, “अब मैंने तुम्हें भगवान तक का रास्ता दिखा दिया है.”

वह व्यक्ति हैरान था. उसने कहा, “मैं भगवान को देख नहीं सकता हूँ.”

मास्टर ने समझाया, “पाँच पत्थर भगवान को देखने में हमारी मुख्य कमज़ोरियों का प्रतीक हैं. वे लोभ, क्रोध, लालच, वासना तथा अहंकार हैं. इनका त्याग करना सीखो. मैं तुम्हें पहले ही सावधान करना चाहूँगा कि यह आसान नहीं होगा. कठिन प्रयास करो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा. जब तुम इन सभी पत्थरों, जो कि तुम्हारे और ईश्वर के बीच पर्दा हैं, को फेंकने में सफल हो जाओगे तब तुम्हें अपने अतिप्रिय प्रभु के दर्शन सहजता से हो जायेंगें.”

अतः उस व्यक्ति ने सूफी मास्टर की देखरेख में सूफी पथ पर अपनी यात्रा आरम्भ की.

                    सीख :

जब हम अपने भीतरी शत्रुओं का त्याग करते हैं(जैसे कि अहंकार, क्रोध, लालच, लोभ, ईर्ष्या इत्यादि) तब हम भगवान को देख सकते हैं और उन्हें आसानी से प्राप्त कर सकते हैं.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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