निःस्वार्थ प्रेम

         आदर्श : प्रेम

    उप आदर्श : देखभाल, बिना शर्त प्रेम

मेरी पत्नी ने बुलाया, “तुम कब तक उस अखबार को पढ़ते रहोगे? sinduक्या तुम यहाँ आकर अपनी लाडली बेटी को खाना खिला सकते हो?” मैंने अखबार फेंका और झटपट घटनास्थान पर गया. मेरी इकलौती बेटी, सिन्दु डरी हुई लग रही थी. उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे और उसके सामने दही चावल से भरा एक कटोरा पड़ा हुआ था. सिन्दु एक अच्छी बच्ची है और अपनी उम्र के हिसाब से काफी समझदार है.

वह हाल ही में आठ साल की हुई है. वह दही चावल से खासतौर से नफ़रत करती है. मेरी माँ और मेरी पत्नी परम्परागत हैं और दही चावल के शीतलतन प्रभाव में दृढ़  विश्वास करते हैं. मैंने अपना गला साफ़ किया और कटोरा हाथ में लिया. ‘सिन्दु, बेटा, तुम इस दही चावल के कुछ ग्रास खा क्यों नहीं लेती?sindu1 अपने पापा की खातिर, बेटा. और अगर तुम नहीं खाओगी तो तुम्हारी माँ मेरे ऊपर चिल्लाएगी.’ मेरी पत्नी मेरे पीछे खड़ी थी और मैं उसके गुस्से को महसूस कर पा रहा था. सिन्दु थोड़ी शांत हुई और उसने अपने हाथ से अपने आँसू पोंछे.

‘ठीक है, पापा. मैं खाऊँगी- सिर्फ कुछ कौर ही नहीं बल्कि पूरा कटोरा. पर आपको…..’ सिन्दु सकुचाई. ‘पापा, अगर मैं सारा दही चावल खा लूँगी तो जो मैं माँगूंगी, आप देंगे?”
‘अवश्य, बेटी.’

‘वादा?’
‘वादा.’

अपनी बेटी के गुलाबी मुलायम हाथों को मैंने अपने हाथ में लिया और सौदा तय कर लिया. ‘माँ से भी कहो कि मुझे ऐसा ही वादा देंगीं,’ मेरी बेटी ने हठ किया. मेरी पत्नी ने सिन्दु के हाथ पर अपना हाथ मारा और बिना किसी भाव के बड़बड़ाई ‘वादा’ . अब मैं थोड़ा बेचैन हो गया. ‘सिन्दु बेटा, तुम्हें कंप्यूटर या ऐसी कोई महंगी चीज़ लेने की ज़िद्द नहीं करनी चाहिए. पापा के पास इस समय इतने पैसे नहीं हैं. ठीक है?’

‘नहीं पापा. मुझे कोई भी कीमती चीज़ नहीं चाहिए.’

धीरे-धीरे और कष्टपूर्वक उसने सारा खाना ख़त्म कर दिया. मन ही मन में मैं, मेरी बेटी को ज़बरदस्ती खिलाने के लिए, अपनी पत्नी व अपनी माँ से नाराज़ था. इस कठिन परीक्षा के बाद, आँखों में उम्मीद लिए, सिन्दु मेरे पास आई. हमारा पूरा ध्यान उस पर था.

‘पापा, मैं इस रविवार को अपना सर गंजा करवाना चाहती हूँ!’ यह मेरी माँग है.

‘भयानक! ‘ मेरी पत्नी चिल्लाई, “एक लड़की होकर गंजा होना? असंभव! ‘

‘हमारे परिवार में कभी नहीं! ‘ मेरी माँ कर्कश आवाज़ में बोली. ‘ यह बहुत ज़्यादा टेलीविज़न देख रही है. टेलीविज़न के इन कार्यक्रमों से हमारी संस्कृति दूषित हो रही है. ‘
“सिन्दु बेटा, तुम कुछ और क्यों नहीं माँग लेती? तुम्हें गंजा देखकर हमें बहुत दुःख होगा. ”

“नहीं, पापा! मुझे कुछ और नहीं चाहिए.’ सिन्दु ने निश्चयात्मकता से कहा.

‘सिन्दु, तुम हमारी भावनाओं को समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? ‘ मैंने उससे प्रार्थना करने की कोशिश की.

‘पापा, आपने देखा कि मेरे लिए दही चावल खाना कितना कठिन था. ‘ सिन्दु की आँखों में पानी था. और आपने मुझ से वादा किया था कि मैं जो भी माँगूंगी आप देंगें. अब आप अपने वादे से मुकर रहे हैं. आप ही ने मुझे राजा हरिश्चंद्र की कहानी और उसका आदर्श बताया था- चाहे कुछ भी हो, हमें हमारे वादों का सम्मान करना चाहिए.

मैंने घोषणा की, ‘हमें अपना वादा निभाना चाहिए.’
‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?’ मेरी माँ और पत्नी एक साथ बोले.

‘नहीं, अगर हम अपने वादे से हट गए तो यह अपने वचन का सम्मान करना कभी नहीं सीखेगी.’

‘सिन्दु, तुम्हारी इच्छा पूरी होगी.’

अपने बाल मुंडवाकर सिन्दु का चेहरा गोल दिख रहा था और उसकी आँखें बड़ी और ख़ूबसूरत प्रतीत हो रहीं थीं.sindu2

सोमवार की सुबह, मैंने सिन्दु को उसके स्कूल छोड़ा. अपने बालों के बिना सिन्दु को अपनी कक्षा की ओर जाते देखना अपने आप में एक दृश्य था. उसने मुड़कर मुझे इशारा किया. मैंने भी उसे मुस्कुराकर इशारा किया. तभी एक लड़का एक गाड़ी से उतरा और चिल्लाया, “सिन्दूजा, मेरे लिए इंतज़ार करो.”

मुझे उस लड़के का बाल रहित सर देखकर आश्चर्य हुआ. “शायद, यह फैशन है, ” मैंने सोचा.

“महाशय, आपकी बेटी सिन्दूजा सचमुच महान है. अपना परिचय दिए बिना, एक महिला गाड़ी से निकली और बोली, ‘वह लड़का जो आपकी बेटी के साथ चल रहा है, वह मेरा बेटा हरीश है. वह लियूकेमिया से पीड़ित है.’ अपनी सिसकियाँ छुपाने के लिए वह कुछ देर रुकी. ‘पिछले महीने हरीश स्कूल नहीं जा पाया था. कीमोथेरेपी की दवाई के दुष्प्रभाव से उसने सारे बाल गवाँ दिए थे. विद्यालय के साथियों द्वारा अनजाने में, पर निष्ठुरता से चिढ़ाने के डर से उसने विद्यालय आने से इंकार कर दिया था.” पिछले हफ्ते सिन्दूजा हरीश से मिलने आई थी और हरीश से वादा किया था कि वह चिढ़ाने के मुद्दे को संभाल लेगी. पर मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि वह मेरे बेटे की खातिर अपने सुन्दर बालों का बलिदान देगी.

“महाशय, आप और आपकी पत्नी का सौभाग्य है कि ऐसी पवित्र आत्मा आपको अपनी बेटी के रूप में मिली है.”
मैं वहाँ स्तंभित खड़ा रहा. और फिर मैं रोया.

“मेरी नन्ही परी, तुम मुझे सचमुच का निस्स्वार्थ प्रेम सिखा रही हो.”

          सीख :

इस भूमण्डल पर सबसे अधिक खुश वो लोग नहीं हैं जो अपनी शर्तों पर जीतें हैं बल्कि वे हैं जो अपने प्रियजनों के लिए अपनी शर्तें बदल देते हैं……

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक : अर्चना

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