ज्ञानी तथा स्टेशन मास्टर – सत्य बोलना

             आदर्श : सत्य
उप आदर्श : ईमानदारी, बदलाव

हिमालय से एक महाज्ञानीsage अपने शिष्य सहित महाद्वीप पर आये थे और शहर में थे. एक रेलवे स्टेशन मास्टर उनके दैवत्व से अति प्रभावित था और उसने महापुरुष से अनुरोध किया कि वह उसे आशीर्वाद दें. स्टेशन मास्टर ने उनसे विनती की कि वह उसे कुछ अभ्यास करने को दें और वादा किया कि वह उसका ईमानदारी से पालन करेगा.

शिष्य ने महाज्ञानी से कहा कि यह सांसारिक लोग उनकी शिक्षाओं का पालन नहीं करेंगें. अतः वह स्टेशन मास्टर को सलाह न दें. परन्तु महापुरुष ने कहा कि स्टेशन मास्टर और उसके विभाग में सभी सहकर्मी भ्रष्ट हैं और वह उनके सुधार के लिए स्टेशन मास्टर को सलाह देंगें. उन्होंने स्टेशन मास्टर से कहा कि वह तीन महीनों तक झूठ न बोलने का अभ्यास करे. ऐसा कहकर वह ज्ञानी पुरुष वहाँ से चले गए.

स्टेशन मास्टर ने ईमानदारी से उनकी सलाह का पालन करने का निश्चय किया. sage1अगले दिन रेलवे विभाग में भ्रष्टाचार के आरोप पर तहक़ीक़ात करने एक अधिकारी स्टेशन मास्टर से मिलने आए. स्टेशन मास्टर ने स्वीकार किया कि उनका विभाग अब तक रिश्वत लेता आया था पर कहा कि अब उसने घूस लेना बंद कर दिया है. उनके सहकर्मी उससे नाराज़ हुए और उन्होंने आयोग से कहा कि स्टेशन मास्टर स्वयं भ्रष्ट है और उन सब को अनावश्यक फँसाना चाहता है.

अंततः स्टेशन मास्टर को सच बोलने के लिए नौकरी से निकाल दिया गया और कारागाह में डाल दिया गया. इस कारण उनकी पत्नी और बेटा उन्हें छोड़कर घर से चले गए. न्यायालय में केस चल रहा था और केस के अंतिम दिन न्यायाधीश ने स्टेशन मास्टर से पूछा यदि वह अपने लिए वकील नियुक्त करना चाहेगा. स्टेशन मास्टर ने कहा कि वह नहीं चाहता है कि कोई उसका केस लड़े और वह अपना तर्क स्वयं प्रस्तुत करना चाहेगा.sage2 फिर उसने महापुरुष के उपदेश का जिक्र किया. बाद में न्यायाधीश ने उसे अपने कक्ष में बुलाकर उस ऋषि के बारे में पूछा. उनके बारे में बताए जाने पर न्यायाधीश खुश हुए क्योंकि वह स्वयं भी उसी महापुरुष की शिक्षाओं पर चलते थे. आखिरकार न्यायाधीश ने उसे केस से रिहा कर दिया.

एक महीने बाद उसे अचानक रेलवे अधिकारियों द्वारा सन्देश प्राप्त हुआ. उनके पिता की ज़मीन, जो रेलवे ने हासिल कर ली थी, के हरजाने में स्टेशन मास्टर को १० लाख रूपए से पुरस्कृत किया जाता है. स्टेशन मास्टर इससे परिचित नहीं था. उसने यह धन अपनी पत्नी और बेटे को दे दिया और कहा कि वह वहाँ से जा रहा है. अगर झूठ नहीं बोलने से १ महीने के अल्प समय में उसे आश्चर्यजनक रूप से इतनी बड़ी धनराशि मिल गई तो आजीवन झूठ न बोलने से क्या होगा? ऐसा सोचकर वह उन महाज्ञानी के साथ अपनी शेष की ज़िन्दगी बिताने के लिए हिमालय चला गया.

सीख :

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है. महान संत व गुरु अच्छे आदर्श सिखाते हैं. उनके उपदेशों को ग्रहण करके उनपर अमल करने से हममें बदलाव आता है.

http://www.saibalsanskaar.wodpress.com
अनुवादक – अर्चना

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