अहिंसा की शक्ति

arun

 आदर्श : अहिंसा
उप आदर्श : ख़ामोशी

डा. अरुण गाँधी, महात्मा गाँधी के पोते तथा अहिंसा हेतु एम. के. गाँधी संस्थान के संस्थापक हैं. उन्होंने पोर्टो रिको विश्वविश्यालय में ९ जून को अपने व्याख्यान के दौरान, परवरिश में अहिंसा के उदहारण में निम्न कहानी बयान की थी- arun 2मैं १६ वर्ष का था और अपने माता-पिता के साथ, अपने दादा द्वारा संस्थापित संस्थान में रहता था. यह संस्थान गन्ने के खेतों के बीच दक्षिण अफ्रीका में डरबन से १८ मील की दूरी पर था. हम शहर से काफी दूर रहते थे और हमारा कोई  पड़ोसी भी नहीं था. अतः मेरी दो बहनें और मैं, दोस्तों को मिलने जाने या सिनेमा देखने के लिए शहर जाने की प्रतीक्षा करते थे. एक दिन मेरे पिता ने मुझसे उन्हें एक दिवसीय सम्मेलन के लिए कार में शहर लेकर चलने को कहा. मैं ख़ुशी से कूद पड़ा. चूँकि मैं शहर जा रहा था, मेरी माँ ने मुझे किराने की सूची दे दी. और चूँकि शहर में मेरे पास पूरा दिन था, मेरे पिता ने भी मुझे कुछ काम-काज बता दिए, जैसे कि गाड़ी की जाँच करवाना.

उस सुबह जब मैंने पिताजी को सम्मेलन के लिए उतारा तो उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें ५ बजे यहीं मिलूँगा और हम घर साथ चलेंगें.” अपना काम जल्दी से ख़त्म करके, मैं सीधा सिनेमाघर गया. मैं सिनेमा में इतना तल्लीन हो गया कि मुझे समय का ध्यान ही नहीं रहा. और जब मुझे याद आया तब ५:३० बज चुके थे; अतः जब तक मैं गाड़ी लेने भागकर गैराज गया और जल्दी-जल्दी उस जगह पहुँचा जहाँ मेरे पिता मेरा इंतज़ार कर रहे थे, तब तक ६ बज गए थे. उन्होंने चिंतित होकर पूछा, “तुम्हें देर क्यों हो गई?” मुझे यह बताते हुए कि मैं सिनेमाघर में था, इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि मैंने कहा, “गाड़ी तैयार नहीं थी, अतः मुझे इंतज़ार करना पड़ा,” न जानते हुए कि पिताजी पहले से ही गैराज से पता कर चुके थे.

जब उन्होंने मेरा झूठ पकड़ा तो उन्होंने कहा,”तुम्हारी परवरिश में मुझसे कहीं गलती हुई है. इस कारण तुममें मुझे सच बताने का आत्मविश्वास नहीं है. यह समझने के लिए कि मुझसे कहाँ गलती हुई है, मैं घर तक १८ मील का रास्ता चलकर जाऊँगा और इस विषय पर विचार करूँगा.” अतः अपने औपचारिक कपड़ों तथा जूतों में, कच्ची व बिना रोशनी की सड़कों पर रात के समय, वे घर के लिए चलना शुरू हो गए. मैं उन्हें छोड़ नहीं सकता था इसलिए अपने बेकार से एक झूठ के कारण उन्हें अत्यंत कष्ट में देखता रहा और ५ १/२ घंटों तक उनके पीछे-पीछे गाड़ी चलाता रहा. मैंने तभी का तभी निश्चय किया कि मैं दुबारा कभी झूठ नहीं बोलूँगा. arun1

अक्सर उस घटना के बारे में सोचकर मुझे अचरज होता है कि अगर मेरे पिता ने मुझे उस प्रकार से दण्डित किया होता जिस तरह से हम अपने बच्चों को सज़ा देते हैं, तो क्या मैं सबक सीख पाता? मुझे नहीं लगता! मैं सज़ा सहन करता और फिर वही चीज़ दोहराता रहता. पर यह एक अहिंसात्मक कार्य इतना बलशाली था कि वह आज भी ऐसे है मानो कल की ही बात हो. यह अहिंसा की शक्ति है.

सीख :

अहिंसा में बहुत शक्ति होती है. अहिंसा के मार्ग पर कायम रहकर भी जीत हासिल की जा सकती है और इसका सर्वोत्तम उदाहरण महात्मा गाँधी हैं. समाज की अधिकतम समस्याओं का हल प्रेम व शान्ति हैं. कई परिस्थितियों में कठोर उपायों की अपेक्षा खामोशी अधिक मूल्यवान सबक सिखा सकती है. कोई आदर्श बतलाने के लिए या बच्चे को सुधारने के लिए, कठोर तरीका अपनाना ज़रूरी नहीं है. इसे अहिंसानात्मक ढ़ंग से भी कर सकते हैं. कई बार ऐसा देखा गया है कि चिल्लाने और क्रोध से बहस व कटुता बढ़ती है. किसी आदर्श के स्थायी असर के लिए अहिंसा अधिक प्रभावशाली साबित हो सकती है.

http:://www.saibalsanskaar.wordpress.com

translation:  अर्चना

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