खच्चर और कुआँ – प्रवृत्ति

आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : आशावादी, रवैया

यह कहानी एक किसान की है जो एक बूढ़े खच्चर का मालिक था. यह खच्चर किसान के कुएँ में गिर गया mule  और किसान ने उसके ढेंचू- ढेंचू की आवाज़ सुनी. परिस्थिति को सावधानी से आंकने के बाद किसान को खच्चर से सहानुभूति तो हुई पर एक बूढ़े खच्चर को बचाने के लिए इतनी तकलीफ़ उठाना किसान ने उपयुक्त नहीं समझा. किसान ने अपने पड़ोसियों को इकट्ठा किया, उन्हें स्तिथि से अवगत कराया और उस बूढ़े खच्चर को कुएँ में दफ़नाकर उसकी मुसीबत ख़त्म करने के लिए उनसे मिट्टी उठाने में उनकी सहायता माँगी.

शुरू में बूढ़ा खच्चर उन्मत्त था. परन्तु जैसे-जैसे किसान और उसके पड़ोसी बेलचे से खोदते गए  mule1 और खच्चर की पीठ पर मिट्टी गिरती गयी, उसे मन में एक ख़याल आया. अचानक उसे ध्यान आया कि हर बार जब बेलचा भर मिट्टी उसकी पीठ पर गिरती है, उसे मिट्टी झाड़ देनी चाहिए और एक कदम उपर उठाना चाहिए. जैसे मिट्टी भर-भरकर उसके उपर गिरती गई, उसने ऐसा ही किया. “मिट्टी झाड़ो और उपर उठो…. मिट्टी झाड़ो और उपर उठो….मिट्टी झाड़ो और उपर उठो !” , यह उसका मन्त्र बन गया और स्वयं को प्रोत्साहित करने के लिए वह इसे दोहराता रहा.

प्रहार चाहे कितने भी कष्टजनक थे और परिस्थिति कितनी भी दुखद प्रतीत हो रही थी, बूढ़े खच्चर ने घबराहट से संघर्ष किया. वह मिट्टी झाड़ता रहा और उपर उठता गया. कुछ ही समय में, क्लांत व पूर्णतः थके हुए बूढ़े खच्चर ने विजयी होकर उस कुएँ की दीवार के पार कदम रखा.mule2

जो उसे लगा था कि उसे दफ़ना देगा, वास्तव में उसके लिए वरदान साबित हुआ- सब उसके विपत्ति सँभालने के तरीके के कारण.

सीख :

अगर हम परेशानियों का बहादुरी से सामना करेंगें, उनका सकारात्मक रूप से जवाब देंगें और घबराहट, कटुता या स्वयं के प्रति हमदर्दी से हार मानने से इंकार करेंगें तो जो विपत्तियाँ हमें दफनाने आतीं हैं, उनमें इतना सामर्थ्य होता है कि वे हमें लाभान्वित करके हमें वरदान दे सकें. जब कठिनाई आती है तो हमें आभारी होना चाहिए. विपत्ति के समय हमें उससे फायदा उठाकर सीख लेनी चाहिए.

http://www.http:://saibalsanskaar.wordpress.com

transaltion: अर्चना

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