नवरात्रि

Durga+Lakshmi+Saraswati

नवरात्रि हिन्दूओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. नवरात्रि का त्यौहार देवी माता के सभी रूपों जैसे दुर्गा, लक्ष्मी तथा सरस्वती की पूजा-अर्चना को समर्पित है. नवरात्रि का अर्थ ‘नौ रातें” होता है- ‘नव’ अर्थात नौ और “रात्रि” अर्थात रात. इन नौ रातों तथा दस दिनों के दौरान शक्ति/देवी के नौ रूपों को पूजा जाता है. दसवें दिन को ‘विजयादशमी’ या ‘दशहरा’ कहा जाता है. यह त्यौहार पूजा तथा नाच-गाने से परिपूर्ण पर्व है और इसे देश भर में हर्षोल्लास से मनाया जाता है.

नवरात्रि का अभिप्राय :

नवरात्रि के दौरान हम ईश्वर के शक्ति भाव का सर्वव्यापी माता के रूप में आह्वान करते हैं. इन्हें साधारणतः दुर्गा के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है जीवन की विपदाओं को मिटाने वाली.

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

इनका उल्लेख ‘भगवती’ या ‘शक्ति’ के रूप में भी किया जाता है. यही शक्ति ईश्वर को सृष्टि, संरक्षण तथा संहार का कार्य करने में मदद करती है. अन्य शब्दों में, ईश्वर अचल है, पूर्णतयः अपरिवर्तनशील है और माँ दुर्गा सबकुछ करतीं हैं. वास्तव में, हमारे द्वारा शक्ति की पूजा वैज्ञानिक सिद्धांत की पुनः पुष्टि करता है कि शक्ति अविनाशी है. वह सदा विद्यमान रहती है- उसकी रचना या नाश संभव नहीं है.

नवरात्रि की परम्परा:

नवरात्रि प्रतिवर्ष पाँच बार मनाई जाती है- वसंत, आषाढ़, शरद, पौष तथा माघ नवरात्रि. इनमें से वसंत नवरात्रि तथा शरद नवरात्रि सर्वाधिक महत्वपूर्ण व लोकप्रिय हैं.

१) वसंत नवरात्रि : वसंत नवरात्रि चैत्र माह( मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है. इस दौरान नौ दिन, शक्ति के नौ रूपों को समर्पित होते हैं. हिन्दू पौराणिक महीनों के अनुसार यह नवरात्रि नए वर्ष का चिन्ह है.

२) आषाढ़ नवरात्रि – आषाढ़ नवरात्रि को गुप्ता गायत्री या शाकम्भरी नवरात्रि भी कहते हैं. इसे आषाढ़ माह(जून-जुलाई) के आषाढ़ शुक्ल पक्ष में मनाते हैं.

३) शरद नवरात्रि – यह सबसे आशिक महत्वपूर्ण नवरात्रि है. इसे महा नवरात्रि कहते हैं और इसे आश्विन मास के उज्जवल पाख के प्रथम दिन से मनाया जाता है. इसे शरद नवरात्रि भी कहते हैं क्योंकि इसे शरद काल(सितम्बर-अक्टूबर) में मनाते हैं.

४) पौष नवरात्रि – पौष नवरात्रि तारशी(दिसंबर-जनवरी) माह के पौष शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है.

५) माघ नवरात्रि – माघ नवरात्रि माघ माह(जनवरी-फरवरी) के माघ शुक्ल पक्ष में मनाते हैं.

नवरात्रि के दौरान देवी के विभिन्न पहलुओं की आराधना करने के लिए इसे ३ भागों में बाँटा जाता है. पहले तीन दिनों में देवी का दुर्गा के रूप में आह्वान किया जाता है ताकि हमारी अशुद्धताओं, अवगुणों एवं त्रुटियों का नाश हो सके. अगले तीन दिन, देवी की आराधना आध्यात्मिक तथा भौतिक सम्पत्ति की दाता, लक्ष्मी के रूप में की जाती है. ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मी अपने भक्तों को अनंत धन-दौलत प्रदान करने की शक्ति रखतीं हैं. आखिर के ३ दिन, देवी का ज्ञान की भण्डार, सरस्वती के रूप में पूजा की जाती है.

नवरात्रि का त्यौहार देश भर में बहुत ही आकर्षक, विशिष्ट और विभिन्न रूपों में आयोजित किया जाता है.

उत्तरी भारत में चैत्र नवरात्रि राम नवमी से समाप्त होती है तथा शरद नवरात्रि दशहरा पर खत्म होती है. नवरात्रि का पर्व सभी नौ दिन व्रत रखकर तथा देवी का भिन्न रूपों में पूजन करके बहुत ही जोश तथा श्रद्धा से मनाया जाता है. ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ प्रायः प्रत्येक घर में होता है. नवरात्रि के नौ दिन अलग-अलग जगहों पर पंडाल लगाकर “रामलीला” का औपचारिक ढ़ंग से अभिनय किया जाता है. ramlila विजय दशमी के दिन अच्छाई की बुराई पर जीत दर्शाने के लिए रावण, कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले जलाये जाते हैं.ravan हिमाचल प्रदेश के कुल्लु क्षेत्र का दशहरा विशेष रूप से प्रख्यात है.

पश्चिम भारत में, खास तौर से गुजरात व मुंबई राज्यों में नवरात्रि का आयोजन सुप्रसिद्ध ‘गरबा’ तथा ‘डांडिया-रास’ नृत्यों से होता है. नर्तक रंग-बिरंगी पोशाकें पहनकर आभूषित छड़िया हाथ में लेकर घेरों में नाचते हैं.

dandiya garba

दक्षिण भारत के लोग नवरात्रि को ‘गोलू’ के रूप में मनाते हैं.

golu
केरल तथा कर्नाटक के कुछ भागों में शरद नवरात्रि की अष्टमी, नवमी और विजयदशमी, सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं. घरों में किताबों को पूजा जाता है. बच्चों में लिखना और पढ़ना आरम्भ करने के लिए विजयदशमी का दिन अति शुभ माना जाता है तथा इसे “विध्यारम्भम” भी कहते हैं.

karnatak
कर्नाटक में “आयुध पूजा” का आयोजन विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों की पूजा से किया जाता है. रोजाना इस्तेमाल के उपकरणों को फूलों से सजाकर, उनकी पूजा की जाती है और आनेवाले समय में सफलता के लिए देवी के आशीर्वाद के आह्वान करते हैं.

पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में शरद नवरात्रि के अंतिम पाँच दिन विशेष हर्ष, उल्लास तथा उत्तेजना से परिपूर्ण होते हैं. इन्हें ‘दुर्गा पूजा’ के रूप में मनाते हैं और यह इस राज्य का सबसे महान और प्रसिद्ध वार्षिक महोत्सव है. ऐसा माना जाता है कि इस काल के दौरान माता दुर्गा ने महिषासुर असुर के रूप में पाप का अंत किया था. D 1731
उत्कृष्ट शिल्पकार दुर्गा माता की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाते हैं और उन्हें अति सुन्दर रूप से आभूषित करते हैं. दुर्गा पूजा का आरम्भ महालय से होता है. उसके पश्चात षष्ठी, महा सप्तमी, महा अष्टमी तथा महा नवमी को देवी की अत्यंत श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा से पूजा- अर्चना होती है. दशमी के दिन भव्य जलूस निकाले जाते हैं और नाच-गाने के साथ माता की मूर्ति जल में प्रवाहित की जाती है.

शक्ति को नौ दिन पूजने का आतंरिक अर्थ:

असुर शब्द “असुषु रमन्ते इति असुरः ” से उत्पन्न हुआ है. अर्थात असुर उसे कहते हैं जो जीवन में केवल आनंद उठाने तथा भौतिक वस्तुओं के भोग-विलास में लीन रहते हैं. ऐसा महिषासुर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विद्यमान है और उसने मानव के भीतरी सात्विक गुणों पर नियंत्रण किया हुआ है. अतः इस महिषासुर के मायावी रूप को जानकर, इसके जाल से मुक्त होने के लिए, अपनी सही पहचान जानने के लिए तथा अपने मूल उद्देश्य पर केंद्रित रहने के लिए शक्ति की पूजा करना आवश्यक है. इसीलिए नवरात्रि के नौ दिन, अपने अंदर विद्यमान अहम् रुपी अंधकार से मुक्त होने के लिए, शक्ति की आराधना की जाती है.

sources: hinduism.about.com

en.wikipedia.org
translation : अर्चना

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s