रक्षा बंधन

rakhi1रक्षा बंधन हिंदूंओ का प्रसिद्ध त्यौहार है. इसे ‘राखी’ का त्यौहार भी कहते हैं. यह हिन्दू कैलेंडर के अनुसार श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है.
रक्षा बंधन का पावन त्यौहार बहन-भाई के मधुर रिश्ते का उत्सव है. इस दिन बहने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधतीं हैं और उनकी लम्बी उम्र, सफलता और खुशियों की ईश्वर से प्रार्थना करती हैं. भाई इस अवसर पर अपनी बहन को उपहार देते हैं एवं उसकी जीवन पर्यन्त सुरक्षा का वचन देते हैं.rakhi3

रक्षा बंधन केवल एक त्यौहार ही नहीं बल्कि हमारी परम्पराओं का प्रतीक है. भारत के इतिहास से रक्षा बंधन उत्सव के कुछ ऐतिहासिक प्रमाण निम्न हैं-
कर्मवती – हुमायूँ
मुगल काल के दौर में जब मुगल बादशाह हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर रक्षा वचन ले लिया।  हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख़्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु  बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती और मेवाड़ राज्य की रक्षा की। 

सुभद्राकुमारी चौहान ने शायद इसी का उल्लेख अपनी कविता, ‘राखी’ में किया है:

मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवाई
रक्षा करने दौड़ पड़े वे
राखी-बन्द शत्रु-भाई॥rakhi4

सिकंदर और पुरू
सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बांध कर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवदान दिया। 

ऐतिहासिक युग में भी सिंकदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रूक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

भगवान कृष्ण – द्रौपदी
लोक रक्षा हेतु भगवान कृष्ण ने दुष्ट राजा शिशुपाल की ह्त्या की थी. युद्ध के दौरान कृष्ण को चोट लगी और उनकी अंगुलियाँ लहू लुहान हो गईं थी. यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा तुरंत फाड़कर कृष्ण की कलाई पर बाँधा था. अपने प्रति द्रौपदी का स्नेह और सहानुभूति देखकर कृष्ण उनके साथ बहन-भाई के प्रेम बंधन में बन्ध गए थे. और भविष्य में ज़रुरत पड़ने पर उन्होंने द्रौपदी को इस क़र्ज़ का भुगतान करने का वचन दिया था. कई वर्ष उपरान्त, जब शतरंज के खेल में पांडव द्रौपदी को हार गए थे तब चीर हरन के दौरान द्रौपदी की साड़ी की लम्बाई निरंतर बढ़ाकर उन्होंने द्रौपदी की मदद की थी.rakhi5

राजा बली व लक्ष्मी देवी

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असुरों का राजा महाबली, भगवान विष्णु का महान भक्त था. उसकी अमित भक्ति के कारण, बली के राज्य की रक्षा करने के लिए, विष्णु वैकुण्ठ छोड़कर उसके पास चले गए. इस कारण लक्ष्मीजी उदास थीं. विष्णु को वैकुण्ठ वापस लाने के लिए, वे बली के महल में ब्राह्मण स्त्री के भेष में गईं. श्रावण की पूर्णिमा पर उन्होंने बली की कलाई पर राखी बाँधी अपनी सही पहचान प्रत्यक्ष की. इसके बदले में बली ने विष्णु को वैकुण्ठ लौटने का आग्रह किया. भगवान विष्णु के प्रति राजा बली की भक्ति के कारण, राखी के त्यौहार को ‘बलेवा’ भी कहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस दिन के बाद से श्रावण पूर्णिमा पर राखी बाँधने के लिए भाइयों द्वारा बहनों को आमंत्रित करने की प्रथा चली.
चंद्रशेखर आजाद का प्रसंग
बात उन दिनों की है जब क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थे और फिरंगी उनके पीछे लगे थे। 

फिरंगियों से  बचने के लिए शरण लेने हेतु आजाद एक  तूफानी रात को एक घर में जा पहुंचे जहां  एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। हट्टे-कट्टे आजाद को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इंकार कर दिया लेकिन जब आजाद ने अपना परिचय दिया तो उसने उन्हें ससम्मान अपने घर में शरण दे दी। बातचीत से आजाद को आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है। आजाद महिला को कहा, ‘मेरे सिर पर पांच हजार रुपए का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ़्तारी पर पांच हजार रुपए का इनाम पा सकती हैं जिससे आप अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं।
यह सुन विधवा रो पड़ी व कहा- “भैया! तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती।” यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आजाद के हाथों में बाँध कर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- “अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आजाद।”

रक्षा बंधन का त्यौहार भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है.

दक्षिण भारत के ब्राह्मण समुदाय श्रावण पूर्णिमा के दिन “उपकर्म” या “अवनि अवित्तम” की विद्धि करते हैं जिसमें वे अपनी जनेऊ बदलते हैं.
भगववान कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम का जन्म श्रावण पूर्णिमा को हुआ था. अतः इसे बलराम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाते हैं.
उत्तरी भारत में इसे ‘राखी पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है.
उड़ीसा में इसे ‘गमह पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है. इस दिन सभी पालतू गायों तथा बैलों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है. परिवार में तथा सगे-सम्बन्धियों में मिठाई का आदान प्रदान होता है. उड़ीसा में शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरम्भ होकर राखी पूर्णिमा तक ‘झूलन यात्रा’ का आयोजन होता है. राधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूले पर बाखूबी सजाया जाता है.
पश्चिम भारत में तथा महाराष्ट्र, गुजरात व गोवा राज्यों में इसे ‘नारियल पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है. इस दिन समुद्रदेव वरुण को सम्मान देने के लिए, सागर को नारियल चढ़ाया जाता है. नारियल पूर्णिमा से मछली पकड़ने का समय भी शुरू होता है. सभी मछुआरे, जो समुद्र पर अपनी जीविका के लिए निर्भर करते हैं, भगवान वरुण को भेंट चढ़ाकर समृद्धि की प्रार्थना करते हैं.
मध्य भारत के राज्य जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड तथा बिहार में यह दिन ‘कजरी पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है. यह किसानों तथा पुत्रों वाली स्त्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है.
गुजरात राज्य के कुछ क्षेत्रों में यह दिन ‘पवित्रोपना’ के रूप में मनाते हैं. इस दिन भगवान शिव की शानदार पूजा-अर्चना की जाती है.
राखी के त्यौहार का उत्सव
राखी के त्यौहार का उत्सव सुबह से ही शुरू हो जाता है. सुबह जल्दी उठकर, नहाकर नूतन कपड़े पहनकर लोग पूजा के लिए एकत्रित होते हैं. ईश्वर की कृपा का आह्वान करके, बहनें भाइयों की आरती उतारतीं हैं, चावल व कुमकुम का टीका लगातीं हैं और मन्त्र उच्चारण के साथ भाइयों को राखी बाँधतीं हैं. बहनें प्रेम से भाइयों को मिठाई खिलातीं हैं और उनकी कुशलता की प्रार्थना करतीं हैं. बदले में, भाई बहनों को उपहार देते हैं, इस वचन के साथ की वे सदा उनकी सुरक्षा करेंगें.

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http://www.raksha-bandhan.com

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