ईश्वर का विनम्र भक्त

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : नम्रता

मेलपथुर नारायण भट्टतिरि, गुरुवायुरप्पन- भगवान कृष्ण के भक्त थे. उन्होंने सम्वत १५८६ में १०३४ छंदों युक्त नारायणीयम के रूप में भागवत पुराण के सारांश की रचना की थी. मेलपथुर भट्टतिरि, अच्युत पिशरोदी के विद्ध्यार्थी थे. उनके गुरु जब बीमार पड़े तब शिष्य होने के नाते मेलपथुर भट्टतिरि ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने गुरु की बीमारी अपने ऊपर ले ली. बीमारी का कोई उपाय नहीं था अतः एज़ुथाचं ने उन्हें गुरुवायुरप्पन का भक्त बनने की हिदायत दी. संस्कृत में विद्वान होने के कारण, मेलपथुर भट्टतिरि प्रतिदिन प्रभु के लिए एक छंद की रचना करते थे. और अंतिम छंद पूरा होने के पश्चात उन्हें उनके रोगों से मुक्ति मिल गई.

पूनतनाम नम्बूदिरी, भगवान गुरुवायुरप्पन के एक विनम्र भक्त थे. poontaउन्होंने प्रभु की प्रशंसा में एक मलयाली गीत ‘ज्ञानप्पन’ लिखा. वे भट्टतिरि के समान विद्वान नहीं थे पर उनके गीत अपनी सादगी व धार्मिक भावना के लिए प्रसिद्द थे. उन्होंने भट्टतिरि से अपने गीतों का संशोधन करने का निवेदन किया. परन्तु भट्टतिरि में नम्रता का अभाव होने के कारण उन्होंने पूनतनाम के संस्कृत ज्ञान का मज़ाक उड़ाया. पूनतनाम घर लौटकर भगवान के समक्ष फूट-फूट कर रोये.

उस रात जब भट्टतिरि नारायणीयम सुनाने की तैयारी कर रहे थे तब एक लड़का उनके घर प्रकट हुआ. narayaneeyam1लड़के को अपने साथ बैठाकर उन्होंने पाठ करना शुरू किया. लड़के ने पहले छंद में ही एक गलती निकाल दी. कवि ने गलती स्वीकार की और अगले छंद की ओर बढ़ गए. लड़के ने दूसरे छंद में दो गलतियाँ अंकित कीं. इस प्रकार तीसरे में तीन इत्यादि. दसवें छंद तक भट्टतिरि समझ गए कि वह बालक स्वयं ईश्वर है. उन्हें स्पष्ट हो गया कि पूनतनाम की भक्ति भगवान को उनकी शिक्षा व विभक्ति (संस्कृत व्याकरण) के उत्कृष्ट ज्ञान से अधिक प्रिय है. वे पूनतनाम के पास दौड़े और उनसे क्षमा याचना की. जब उन्होंने ‘ज्ञानप्पन’ पढ़ा तो पाया कि वह दोषरहित था.

सीख:

ईश्वर के लिए प्रेम व विनम्रता रहित ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण विश्वास व श्रद्धा है. विनम्रता चरित्र निर्माण का प्रमाण-चिन्ह है.

 

http:://www.saibalsanskaar.wordpress.com

translation: अर्चना

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