ज्ञान का दीप जलाना

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आदर्श : सत्य
उप आदर्श : ज्ञान

एक साधक जो ईश्वर के बारे में जानने का अति अभिलाषी था, अपने ज्ञान के नेत्र खुलवाना चाहता था. उसने एक गुफा में प्रवेश किया जहाँ एक गुरु रहते थे. गुफा में घुसते समय उसे एक हलकी रोशनी दिखाई दी.lamp1 पर जैसे ही वह आगे बढ़ा, वह लघु रोशनी भी बूझ गई. अंधकार में हमें डर लगता है और डर में हम भगवान को और अधिक याद करते हैं. अतः उसने ज़ोर से “नमः शिवाय” दोहराया. यह सुनकर साधु ने उससे पूछा कि वह कौन है. उसने कहा कि वह उनकी कृपा प्राप्त करने आया था. वह महान ऋषि स्वयं को हवा के श्वसन से जीवित रखते थे और अपने पर्यटक के मन को जानने की क्षमता भी रखते थे. ऋषि ने कहा कि वह उसके प्रश्न का उत्तर बाद में देंगे. उन्होंने उसे पहले दीया जलाने को कहा, जो कि बूझ गया था. पर्यटक ने माचिस लेकर दीया जलाने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुआ. उसने गुरु से कहा कि उसने माचिस की सारी तीलियाँ ख़त्म कर दीं पर फिर भी दीप नहीं जला पाया था.

गुरु ने तब उसे दीया खोलकर, सारा पानी निकालकर उसमें तेल डालने को कहा. और पुनः दीया जलाने की कोशिश करने को कहा. उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया पर दीपक फिर भी नहीं जला. गुरु ने तब कहा कि संभवतः बत्ती पानी से गीली थी. अतः उसे खुले में अच्छी तरह सूखाकर, दीया जलाने का प्रयास करने को कहा. पर्यटक ने वैसा ही किया और सफल हो गया.lamp फिर उसने अपने प्रयोजन का जिक्र करने का साहस किया तथा गुरु से याचना की. विस्मित गुरु ने कहा कि अबतक उसे उपयुक्त उत्तर ही दिया जा रहा था. पर्यटक ने विनती की कि नादान होने के कारण वह उनकी शिक्षा का अर्थ समझ नहीं पाया था. उसने गुरु से उसे और अधिक स्पष्ट शब्दों में समझाने को कहा. गुरु ने कहा :

“तुम्हारे हृदय के बर्त्तन में, तुम्हारे जीवन की बत्ती है. अब तक यह बत्ती तुम्हारी इच्छाओं जैसे लालच, अहम्, ईर्ष्या इत्यादि, के पानी में डूबी हुई है. इसलिए तुम ज्ञान का दीपक नहीं जला पा रहे हो. अपने हृदय के बर्त्तन से इन इच्छाओं का सारा पानी निकालकर, इसे प्रेम से भर दो. अपने जीवन की बत्ती लेकर इसे दृढ़ता की धूप में सूखाओ; कामना के रूप में उपस्थित पानी निचोड़कर, हृदय में श्रद्धा तथा विश्वास का तेल डालो. तुम्हारे लिए ज्ञान का दीप जलाना संभव हो पाएगा. ”

सीख:
हम सभी के अंदर निर्मल हृदय है. हम अपने दिमाग में विचारों की भीड़ तथा कामना, क्रोध, लालच, अभिमान, अनुराग तथा ईर्ष्या नामक छह भीतरी शत्रुओं के कारण इसे देख नहीं पाते हैं. इन सब के ऊपर अहम् है. एक बार हम अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों को दूर करना शुरू कर देंगे तो हमारा प्रकाश अपने आप चमकने लगेगा.

http://www.sathya.org.uk/resources/books/chinnakatha/getstory.php?id=131

http://saibalsanskaar.wordpress.com

translation:   अर्चना

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