धुलाई की ज़रूरत है

rain

आदर्श: सत्य
उप आदर्श: आशावाद

एक नन्ही लड़की अपनी माँ के साथ वॉल मार्ट में खरीदारी कर रही थी. वह लगभग छह वर्ष की होगी- ख़ूबसूरत लाल बाल और चित्तीदार मासूम चेहरा.

बाहर भीषण वर्षा हो रही थी. बारिश इतनी तेज़ थी कि पानी बरसात की नालियों में भर कर ऊपर आ चूका था मानो धरा को छूने की जल्दी में हो. हम सब, तिरपाल के नीचे, वॉल मार्ट के दरवाज़े के ठीक अंदर, खड़े थे. हम सब इंतज़ार कर रहे थे- कुछ धैर्यपूर्वक और कुछ झुँझलाकर- क्योंकि प्रकृति ने उनका दिन अस्तव्यस्त कर दिया था.

मैं बारिश से हमेशा मंत्रमुग्ध हो जाती हूँ. गगन के संसार की धूल और मिट्टी धोने के दृश्य व ध्वनि में, मैं गुम हो जाती हूँ. बचपन के अल्हड़पन में छपछपाते हुए भागने की यादें, मेरे चिंता युक्त दिन में सुखद अवकाश बनकर, उमड़ती हुई आईं.

उसके नन्हे मधुर स्वर ने हम सबका सम्मोहन खंडित किया जब उसने कहा, “माँ, चलो बारिश में भागते हैं”.
“क्या?” माँ ने पूछा.
“चलो बारिश में भागते हैं!” उसने दोहराया.
माँ ने उत्तर दिया, “नहीं बेटा. हम बरसात के कम का इंतज़ार करते हैं.”

इस युवा बच्चे ने १ मिनट इंतज़ार किया और पुनः कहा, “माँ, चलो बरसात में भागते हैं.”
“अगर हम भागे तो पूरी तरह भीग जायेंगे.” माँ ने कहा.
“नहीं, हम नहीं भीगेंगे, माँ. आपने आज सुबह तो ऐसा नहीं कहा था,” युवा लड़की ने अपनी माँ की बाह को झटके से खीचते हुए कहा.
“आज सुबह? मैंने कब कहा था कि हम बरसात में भाग सकते हैं और गीले नहीं होंगे?”
“आपको याद नहीं है? जब आप पिताजी से उनके कैंसर के बारे में बात कर रहे थे, आपने कहा था, “अगर भगवान हमें इससे निकाल सकते हैं, तो वह हमें किसी परिस्थिति से भी निकाल सकते हैं.”

सारी भीड़ मानो खामोशी से थम सी गई. बारिश के सिवाय और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. हम सब चुपचाप खड़े थे. माँ ने क्षणभर रूक कर सोचा कि वह क्या बोलें.

कुछ लोग इस पर हँस पड़ेंगे और कुछ अन्य उन्हें नादान होने के लिए गुस्सा करेंगे. कुछ इस व्यक्तव्य को अनदेखा भी कर देंगें. पर एक छोटे बच्चे की ज़िन्दगी में यह अभिपुष्टि का पल था. ऐसा समय जब मासूम भरोसे का विकास कर सकते हैं ताकि विश्वास का फूल खिल सके.
“बेटा, तुम बिलकुल सही हो. चलो, बारिश में भागते हैं. अगर भगवान हमे गीला होने देते हैं तो संभवतः हमें धुलाई की आवश्यकता है,” माँ ने कहा.

और फिर वे दोनों भाग लिए. जब वे कीचड़ से होते हुए गाड़ियों से आगे भागे, हम सब वहाँ खड़े मुस्कुराते और हँसते हुए उन्हें देख रहे थे. वे पूरी तरह से भीग गए.

कुछ लोगों ने उनका अनुकरण किया तथा बच्चों की तरह चिल्लाते और हँसते हुए अपने वाहनों तक दौड़े. और मैंने भी ऐसा ही किया. मैं भागी. मैं गीली हुई. मुझे भी धुलाई की ज़रूरत थी.

   सीख:

अपने कथन पर विश्वास रखो. अपने कथन को सार्थक रख उसे हर परिस्तिथि में प्रयोग करो. जब हम किसी बालक से विश्वास रखने को कहते हैं, पहले हमें खुद भरोसा होना चाहिए. तभी हम उस बालक (या जिसे हम सलाह दें) को यकीन दिला सकते हैं कि विश्वास में शक्ति है.
प्रत्येक प्रतिकूल परिस्तिथि का सकारात्मक पक्ष लो. यह हमें कुछ सबक सिखाने आई है.

 

Courtesy:http://moralsandethics.wordpress.com/2008/09/01/need-washing-2/

http:://www.saibalsanskaar.wordpress.com

 

अर्चना द्वारा अनुवादित

 

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