प्रभु क्या आप हार नहीं मानने का एक कारण दे सकतें हैं

 

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : विश्वास, दृढ़ता

 

एक दिन मैंने सब कुछ छोड़ने का निश्चय किया- मैंने अपनी नौकरी, अपने रिश्ते, अपनी आध्यात्मिकता छोड़ दी- मैं अपनी ज़िन्दगी भी त्यागना चाहता था.

मैं भगवान से एक आखिरी वार्तालाप करने जंगल गया.

“भगवान”, मैंने कहा, “क्या आप हार नहीं मानने का एक कारण दे सकते हैं?” भगवान के उत्तर ने मुझे चकित कर दिया.
उन्होंने कहा, “अपने आसपास देखो. क्या तुम फ़र्न और बॉस देख रहे हो?”
मैंने उत्तर दिया, “जी” .
“जब मैंने फ़र्न और बॉस के बीज बोए थे तब मैंने उनकी बहुत अच्छी देखभाल की थी. मैंने उन्हें रोशनी दी. मैंने उन्हें पानी दिया.fern rain फ़र्न का पौधा झटपट धरती से निकल आया. उसकी उत्कृष्ट हरियाली ने धरती को ढक दिया. लेकिन अभी भी बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा. परन्तु मैंने बॉस को छोड़ा नहीं.

दूसरे वर्ष में फ़र्न का पौधा बढ़कर और अधिक आकर्षक और समृद्ध हो गया.fern और एक बार फिर, बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा. परन्तु मैंने बॉस को त्यागा नहीं.

तीसरे और चौथे सालों में भी बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा . लेकिन मैंने बॉस को छोड़ा नहीं.

फिर पाँचवे वर्ष में, ज़मीन से एक नन्हा सा अंकुर उभरा. फ़र्न की तुलना में वह काफ़ी छोटा व मामूली था.
लेकिन केवल छह महीने बाद, बॉस बढ़कर १०० फुट से भी अधिक ऊँचा हो गया. उसने पाँच वर्ष अपनी जड़ें बढ़ाने में बिताए थे. उन जड़ों ने उसे मज़बूत बनाया और वह सब कुछ दिया जो उसके जीवित रहने के लिए आवश्यक था. मैं अपनी किसी भी सृष्टि को ऐसी चुनौती नहीं दूँगा जो वह निभा न पाए.

“मेरे बच्चे, क्या तुम्हें पता है कि तुम जो इस समय तक संघर्ष कर रहे थे,तुम वास्तव में अपनी जड़े बढ़ा रहे थे. मैं बॉस को नहीं छोड़ूंगा. तुम्हें भी मैं कभी नहीं छोड़ूंगा.”

उन्होंने जहा, “दूसरों से अपनी तुलना मत करो. बॉस का फ़र्न से भिन्न प्रयोजन था. फिर भी वह दोनों वन को ख़ूबसूरत बनातें हैं.”

ईश्वर ने मुझसे कहा, “तुम्हारा समय आएगा. तुम ऊँचा उठोगे.”

“मुझे कितना ऊँचा उठना चाहिए?” मैंने पूछा.

“बॉस कितना ऊँचा बढ़ता है?” उन्होंने मुझसे पलटकर पूछा.

“”वह जितना ऊँचा बढ़ सकता है.” मैंने जवाब दिया .

उन्होंने कहा, “हाँ. तुम जितना ऊपर उठ सकते हो, उतना उठकर मुझे गौरवान्वित करो.”

मैं जंगल से चला आया इस विश्वास के साथ कि भगवान मुझे कभी नहीं छोड़ेगें. और वे तुम्हारा त्याग भी कभी नहीं करेंगें.

अपने जीवन में एक दिन भी पश्चाताप न करो.

अच्छे दिन तुम्हें ख़ुशी देतें हैं; बुरे दिन तुम्हें अनुभव देतें हैं. दोनों जीवन के लिए अनिवार्य हैं.

सीख:

हमें हमारा कर्त्तव्य करते रहना चाहिए और शेष उनपर छोड़ देना चाहिए. अपने कार्य में हमें समर्पित व अटल रहना चाहिए. सदा सर्वोत्तम देना चाहिए और कभी हार नहीं माननी चाहिए . दृढ़ विश्वास रखना चाहिए; सफलता निश्चित मिलेगी. हमें सर्वदा ध्यान रखना चाहिए कि हम सबका जीवन में विभिन्न उद्देश्य है और हमें उसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए. हमें दूसरों से तुलना करना छोड़कर, अपना मानदंड स्वयं बनकर, अपने लक्ष्य पर केंद्रित होकर खुद में निरंतर सुधार करना चाहिए.

 

अर्चना द्वारा अनुवादित

http://saibalsanskaar.wordpress.com

 

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