बाघ और लोमड़ी- उप आदर्श : आत्मविश्लेषण- आदर्श :धर्म

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एक घने जंगल में एक लोमड़ी रहती थी. काफी समय पहले उसने अपनी आगे की टांगें गवाँ दी थीं .  किसी को ज्ञात नहीं था कैसे : सम्भवतः जाल से बचते हुए.  उस जंगल के किनारे एक व्यक्ति रहता था जो समय- समय पर लोमड़ी को देखता था और देखकर अचंभित होता था कि वह अपने खाने की व्यवस्था कैसे करती होगी.  एक दिन जब वह  लोमड़ी से ज्य़ादा दूर नहीं था, एक बाघ को उस ओर आते देख, वह झटपट छिप गया.  बाघ के पंजों में ताज़ा शिकार था.  भूमि पर लेटकर, बाघ ने भर पेट खाया और अवशेष लोमड़ी के लिए छोड़ दिया.

अगले दिन भी, इस विश्व के महान प्रबंधक ने लोमड़ी के लिए उसी बाघ द्वारा खाद्य आपूर्ति भेजी. वह व्यक्ति सोचने लगा, “अगर कोई अदृश्य सर्वोत्तम शक्ति इस लोमड़ी को रहस्यमय प्रकार से खाना भेज सकती है, तो क्यों न मैं भी एक कोने में बैठकर अपने रोज़ के भोजन का प्रबंध कर लूँ?

……….

क्योंकि उसमें  भरपूर विश्वास था, भोजन के इंतज़ार में, दिन पर दिन बीतते गए. कुछ नहीं हुआ. उसका  वज़न और बल निरंतर घटता गया जबतक कि वह लगभग कंकाल के समान रह गया.  जब वह अपनी चेतना गँवाने ही वाला था, उसे एक आवाज़ सुनाई दी जिसने कहा, “अरे, तुम्हें मार्ग का चयन करने में भूल हुई है, अब सत्य देखो. तुम्हें उस बाघ के उदाहरण का अनुकरण करना चाहिए था ना कि अपंग लोमड़ी का.

उत्तरदायित्व    :  ताकत

गैर जिम्मेदारी :  कमज़ोर बनाती है .

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