प्रेम का विकास करो और द्वेष का त्याग करो

Develop love

 आदर्श: धर्म

उप आदर्श: क्षमा

एक बालविहार अध्यापक ने अपनी कक्षा को एक खेल खिलाने का निश्चय किया.

अध्यापक ने हर छात्र से एक प्लास्टिक की थैली में कुछ आलू  डाल कर लाने के लिए कहा. खेल के नियम अनुसार प्रत्येक छात्र को अपनी थैली के आलूओं को उन छात्रों का नाम देना था जिनसे वह नफरत करता है. अतः एक छात्र की थैली में आलूओं की संख्या उन व्यक्तिओं की संख्या पर निर्भर करेगी जिनसे वह घृणा करता है.

निर्धारित दिन पर, सभी छात्र कुछ आलू ले कर आये, जिन पर उनके द्वारा घृणा करने वाले व्यक्ति का नाम लिखा था. कुछ के पास २ आलू थे, कुछ के पास ३ और कुछ के पास ५ आलू थे. अध्यापक ने फिर बच्चों से कहा कि वे, एक सप्ताह तक, आलू की थैली अपने साथ हर जगह लेकर जाए( शौचालय में भी ).

दिन पर दिन बीतते गए और बच्चों ने सड़े हुए आलूओं से गन्दी बदबू आने की शिकायत करनी शुरू कर दी. इसके इलावा जिनके पास ५ आलू थे, उन्हें अधिक भारी थैली भी उठानी पड़ रही थी. १ सप्ताह के बाद जब खेल अंततः समाप्त हुआ तब बच्चों की जान में जान आई  …

अध्यापक ने पूछा, “१ सप्ताह तक तुम्हें अपने साथ आलू उठाते हुए कैसा महसूस हुआ? “बच्चों ने अपनी निराशा व्यक्त की और हर जगह बदबूदार और भारी आलू उठाने से होने वाली परेशानी की शिकायत करने लगे.

फिर अध्यापक ने उन्हें खेल का गुप्त उद्देश्य बताया.  अध्यापक ने कहा, “जब तुम अपने दिल में किसी के प्रति घृणा रखते हो, तो स्थिति बिलकुल ऐसी ही होती है.  नफ़रत की दुर्गन्ध तुम्हारे ह्रदय को दूषित कर देती है और तुम हर जगह उसे अपने साथ लिए घूमते रहते हो. अगर तुम सड़े आलूओं की दुर्गन्ध १ सप्ताह के लिए भी सहन नहीं कर सकते, तो क्या तुम अनुमान लगा सकते हो कि उम्र भर अपने हृदय में घृणा की दुर्गन्ध रखना कैसा होता होगा??? ”

 सीख :

अपने दिल से किसी के भी प्रति घृणा को निकाल फेंको ताकि तुम्हें उम्र भर पाप न उठाना पड़े. दूसरों को क्षमा करना सबसे अच्छी प्रवृत्ति है.

सच्चा प्रेम, सम्पूर्ण व्यक्ति को प्यार करना नहीं बल्कि त्रुटिपूर्ण व्यक्ति को प्यार करना होता है.

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